अंधविश्वास पर भारी पड़ी ‘आशा’: झाड़-फूंक के चक्कर में 1.7 किलो की रह गई थी मासूम, आशा कार्यकर्ता ने ऐसे बचाई जान

0
15

Drnewsindia

भोपाल (बैरसिया)। विज्ञान और आधुनिक चिकित्सा के दौर में आज भी अंधविश्वास मासूम जिंदगियों पर भारी पड़ रहा है। बैरसिया के ग्राम आकिया में एक 15 दिन की नवजात बच्ची मौत के मुंह में जाने ही वाली थी, लेकिन एक आशा कार्यकर्ता की जिद और सूझबूझ ने उसे नई जिंदगी दे दी।

जन्म के बाद घटने लगा वजन: 2.5 किलो से 1.7 किलो पर आई मासूम

17 दिसंबर को जन्मी इस बच्ची का वजन जन्म के समय 2.5 किलोग्राम (सामान्य) था। लेकिन जन्म के कुछ ही दिनों बाद उसकी तबीयत बिगड़ने लगी।

  • 7वां दिन: वजन घटकर 2.10 किलो हुआ।
  • 10वां दिन: वजन महज 1.7 किलोग्राम रह गया।
  • खतरा: नवजात के शरीर में इतनी तेजी से गिरावट का मतलब सीधा ‘मल्टी ऑर्गन फेलियर’ या मौत का खतरा था।

झाड़-फूंक की जिद और ‘सिस्टम’ की जंग

बच्ची की हालत गंभीर थी, लेकिन परिजन उसे अस्पताल ले जाने के बजाय ‘नजर दोष’ और ‘बाहरी हवा’ मानकर झाड़-फूंक कराने पर अड़े रहे। यहीं पर आशा कार्यकर्ता सुमन लोवंशी देवदूत बनकर सामने आईं।

  1. नियमित निगरानी: सुमन ‘गृह आधारित शिशु स्वास्थ्य देखभाल’ के तहत लगातार घर का दौरा कर रही थीं।
  2. समझाइश विफल: जब परिजन अस्पताल जाने को तैयार नहीं हुए, तो सुमन ने हार नहीं मानी।
  3. उच्च अधिकारियों को अलर्ट: उन्होंने मामले की गंभीरता को देखते हुए तुरंत आशा सुपरवाइजर और CMHO कार्यालय को सूचना दी।
  4. रेस्क्यू: ब्लॉक स्तरीय टीम और प्रशासनिक दबाव के बाद 26 दिसंबर को 108 एंबुलेंस से बच्ची को कमला नेहरू अस्पताल (भोपाल) में भर्ती कराया गया।

“शिशु मृत्यु दर कम करने के लिए हमारी टीम घर-घर जाकर बच्चों की निगरानी कर रही है। यह मामला दिखाता है कि समय पर लिया गया सही फैसला कितना जरूरी है।” — डॉ. मनीष शर्मा, CMHO भोपाल

अब खतरे से बाहर है मासूम

कमला नेहरू अस्पताल में सही पोषण और डॉक्टरी इलाज मिलने के बाद बच्ची के वजन में सुधार हो रहा है। परिजनों ने भी अब राहत की सांस ली है और स्वीकार किया है कि अंधविश्वास के कारण वे अपनी बच्ची को खो सकते थे।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here