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रायसेन | सोमवार, मार्च 23, 2026
चैत्र नवरात्रि के पावन पर्व पर रायसेन से महज 13 किलोमीटर दूर स्थित परवरिया गांव श्रद्धा के केंद्र में है। यहाँ प्राचीन माँ हरसिद्धि देवी के दरबार में पाँच जिलों के श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ रहा है। अमावस्या से शुरू हुआ यह एक महीने का वार्षिक मेला अब अपने पूरे यौवन पर है।
✨ पाँच जिलों की ‘कुलदेवी’: दाल-बाटी और चूरमे का दिव्य भोग
यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि रायसेन, विदिशा, भोपाल, सीहोर और सागर जिलों के हजारों परिवारों की आस्था का आधार है। यहाँ की परंपरा बेहद अनूठी है:
- परिसर में रसोई: श्रद्धालु होटल या घर का बना खाना नहीं, बल्कि मंदिर परिसर में ही स्वयं दाल-बाटी और चूरमे का भोग तैयार करते हैं।
- अटूट नियम: मान्यता है कि यदि किसी परिवार ने यहाँ एक बार माँ का प्रसाद ग्रहण कर लिया, तो उसे हर साल सपरिवार हाजिरी लगानी ही पड़ती है।
📜 इतिहास की झलक: राजा विक्रमादित्य और ‘धुरी’ टूटने का चमत्कार
मंदिर का इतिहास उज्जैन के प्रतापी राजा विक्रमादित्य से जुड़ा है। प्रचलित कथा के अनुसार:
“राजा विक्रमादित्य बैलगाड़ी में माँ हरसिद्धि की प्रतिमाएं लेकर जा रहे थे। जब उनका काफिला परवरिया पहुँचा, तो एक नीम के पेड़ के नीचे विश्राम किया गया। सुबह चलते समय अचानक बैलगाड़ी के पहिए की धुरी टूट गई और गाड़ी पलट गई। चमत्कारिक रूप से माता की तीन पिंडी रूपी प्रतिमाएं वहीं एक चबूतरे पर स्वतः स्थापित हो गईं। राजा ने इसे ईश्वरीय संकेत माना और विधि-विधान से माता को वहीं विराजित किया।”
🏛️ विकास और व्यवस्था: श्रद्धालुओं के दान से संवर रहा दरबार
मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष ऋषि नाथ कुशवाहा और पुजारी राज दीक्षित के अनुसार, मेले में आने वाले दान का उपयोग मंदिर के सौंदर्यीकरण और विकास कार्यों में किया जा रहा है। परवरिया का यह दरबार उज्जैन और तरावली के बाद माँ हरसिद्धि के तीन प्रमुख शक्ति केंद्रों में से एक माना जाता है।
Quick Highlights (एक नज़र में)
| विवरण | जानकारी |
| स्थान | परवरिया गांव, जिला रायसेन (MP) |
| मुख्य भोग | पारंपरिक दाल-बाटी और लड्डू चूरमा |
| मेला अवधि | अमावस्या से पूरे एक महीने तक |
| मान्यता | उज्जैन के राजा विक्रमादित्य द्वारा स्थापित |
| प्रमुख जिले | रायसेन, विदिशा, भोपाल, सीहोर, सागर |




