drnewsindia.com/पीथमपुर (मध्य प्रदेश): जिले के पीथमपुर से एक रूह कंपा देने वाली घटना सामने आई है। यहाँ बोर्ड परीक्षा के दौरान गणित का पेपर दे रही एक नाबालिग छात्रा ने परीक्षा केंद्र के शौचालय में बच्चे को जन्म दिया। इस घटना ने न केवल स्कूल प्रबंधन बल्कि समाज और अभिभावकों की सजगता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
परीक्षा हॉल से अस्पताल तक: क्या हुआ उस दिन?
- पेपर के बीच उठी छात्रा: सेक्टर-1 स्थित हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी के परीक्षा केंद्र पर 10वीं की छात्रा गणित का पेपर दे रही थी। अचानक वह शौचालय जाने की बात कहकर उठी।
- 15 मिनट का सस्पेंस: जब छात्रा काफी देर तक नहीं लौटी, तो केंद्र प्रभारी नरेंद्र कुमार पोथे ने संदेह होने पर एक महिला कर्मचारी को भेजा।
- शौचालय में नवजात: महिला कर्मचारी ने देखा कि दरवाजा बंद था और अंदर से बच्चे के रोने की आवाज आ रही थी। दरवाजा खोलने पर अंदर नवजात बच्चा और बदहवास छात्रा मिली।
- अफरा-तफरी और रेस्क्यू: स्कूल में तुरंत हड़कंप मच गया। आनन-फानन में पुलिस और 108 एम्बुलेंस को बुलाया गया। जच्चा और बच्चा दोनों को तुरंत पीथमपुर के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भेजा गया।
विशेषज्ञों की चेतावनी: ‘हाई रिस्क प्रेग्नेंसी’ और जान का खतरा
भोपाल की प्रसिद्ध स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. विमला सिंह ने इस मामले को बेहद गंभीर बताया है:
“14-16 साल की उम्र शारीरिक और मानसिक रूप से गर्भावस्था के लिए तैयार नहीं होती। इसे ‘हाई रिस्क प्रेग्नेंसी’ की श्रेणी में रखा जाता है। प्रसव के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव (Hemorrhage), एनीमिया और ब्लड प्रेशर बढ़ने से बच्ची की जान जाने का बड़ा जोखिम रहता है।”
गंभीर सवाल जो समाज से पूछे जाने चाहिए:
- 9 महीने तक बेखबर क्यों?: आखिर नौ महीने तक किसी शिक्षक, वार्डन या परिवार को इस प्रेग्नेंसी का पता क्यों नहीं चला? यह घोर लापरवाही का मामला है।
- मानसिक सदमा (Trauma): इतनी कम उम्र में अनचाही गर्भावस्था को छिपाना और अकेले प्रसव का सामना करना, बच्ची के लिए गहरा मानसिक आघात है। उसे तत्काल मनोवैज्ञानिक परामर्श की जरूरत है।
⚖️ पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई
सूचना मिलते ही पुलिस अस्पताल पहुँची और छात्रा के बयान दर्ज किए। पुलिस अब इस मामले की तह तक जाने की कोशिश कर रही है कि इस स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है और क्या इसमें कोई आपराधिक पहलू (जैसे पॉक्सो एक्ट) शामिल है।
वेब एडिटर नोट:
यह घटना हमें याद दिलाती है कि बच्चों के साथ निरंतर संवाद और उनके शारीरिक-मानसिक बदलावों पर नजर रखना कितना अनिवार्य है। अभिभावकों और शिक्षकों की सतर्कता ही ऐसे हादसों को रोक सकती है।




