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ब्रज की माटी में होली का रंग ऐसा चढ़ा है कि हर ओर बस ‘जय राधे-जय कृष्णा’ की गूंज है। आज रविवार है और गोकुल की गलियां भक्तों से पटी पड़ी हैं। कोई अबीर लाया है तो कोई रंग, लेकिन सबकी नजरें टिकी हैं उस छड़ी पर, जो आज वात्सल्य और प्रेम का प्रतीक बनेगी।

बाल गोपाल की लीला: क्यों खास है छड़ीमार होली?
जहाँ बरसाना और नंदगाँव में भारी ‘लट्ठ’ चलते हैं, वहीं गोकुल में बाल स्वरूप कान्हा को चोट न लग जाए, इसलिए यहाँ की गोपियाँ छोटी और कोमल छड़ी का उपयोग करती हैं।
- उद्देश्य: दंड देना नहीं, बल्कि बाल लीलाओं की मधुर स्मृति को जीवित करना।
- प्रतीक: यह होली वात्सल्य, कोमल भावनाओं और भक्त-भगवान के बीच के लाड़ का प्रतीक है।

⚡ LIVE अपडेट्स: गोकुल होली महोत्सव 2026
| समय | मुख्य झलकियाँ |
| 10:06 AM | पुंडरीक महाराज की रंगीली यात्रा: पुंडरीक गोस्वामी महाराज अपनी गाड़ी से भक्तों पर रंग बरसा रहे हैं। उन्होंने संदेश दिया— “सब जग होरी, ब्रज होरा”। यह यात्रा एकता और प्रेम का प्रतीक है। |
| 09:43 AM | गोपियों का ‘हुरंगा’: मुरलीधर घाट पर महिलाएं गोपियों का रूप धरकर पहुँच चुकी हैं। यहाँ पुरुषों (हुरियारों) पर प्रेमपूर्वक छड़ी बरसाई जाएगी। |
| 09:32 AM | मुरलीधर घाट की महिमा: मान्यता है कि यहीं कान्हा ने पहली बार बांसुरी बजाई थी। थोड़ी देर में नंदभवन से ठाकुर जी का डोला यहीं पहुँचेगा और उत्सव की शुरुआत होगी। |
| 09:19 AM | ऐतिहासिक कथा: कान्हा की शरारतों से तंग आकर गोपियाँ उन्हें छड़ी लेकर दौड़ाती थीं। आज वही शरारत परंपरा बन गई है। |
“ब्रज की होरी ऐसी है जग होरी ब्रज होरा।” > — पुंडरीक गोस्वामी महाराज
उत्सव की झलक
- नंदभवन से डोला प्रस्थान: बाल कृष्ण पालकी में सवार होकर भक्तों को दर्शन देने निकलेंगे।
- प्रतीकात्मक होली: चोट से बचाने के लिए केवल छोटी छड़ी का उपयोग।
- भक्तों का हुजूम: देश-विदेश से आए श्रद्धालु अबीर और गुलाल के साथ तैयार हैं।




