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ICSSR के सहयोग से जुटे देशभर के दिग्गज; शोधार्थियों ने आदिवासी ज्ञान और लोक परंपराओं के संरक्षण पर रखे विचार
भोपाल | 11 फरवरी, 2026
रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय (RNTU), भोपाल में भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR) के सौजन्य से आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘भारतीय ज्ञान परम्परा: मूल एवं विकास’ का सफल समापन हुआ। इस संगोष्ठी ने न केवल प्राचीन ज्ञान को आधुनिक संदर्भों से जोड़ा, बल्कि शोध और संवाद के नए आयाम भी स्थापित किए।

उद्घाटन सत्र: स्वभाषा और स्वदेशी पर जोर
6 फरवरी को उद्घाटन सत्र के दौरान JNU की प्रो. वंदना झा ने युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ने की वकालत की।
- प्रमुख विचार: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 का मूल आधार ही स्वभाषा और लोक परंपराओं का संरक्षण है।
- तार्किक आधार: प्रो. मिथिलेश तिवारी ने नचिकेता का उदाहरण देते हुए भारतीय ज्ञान को जिज्ञासा और तर्क की पराकाष्ठा बताया।
- विशेष: इस अवसर पर संगोष्ठी की ‘स्मारिका’ का विमोचन और पुरातात्विक साक्ष्यों पर आधारित एक विशेष प्रदर्शनी का उद्घाटन भी किया गया।
वैश्विक प्रासंगिकता: भारत का ज्ञान, विश्व का कल्याण
संगोष्ठी के दूसरे दिन विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय ज्ञान केवल अतीत की बात नहीं, बल्कि भविष्य की जरूरत है।
- श्रेष्ठता का मार्ग: डॉ. मुकेश मिश्रा ने कहा कि भारतीय परंपरा मनुष्य को श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर बनाने की सर्वकालिक व्यवस्था है।
- विश्व शांति: डॉ. सितांशु त्रिपाठी ने स्पष्ट किया कि ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भारतीय दृष्टि ही आज के दौर में विश्व शांति के लिए अनिवार्य है।
- वैज्ञानिक पक्ष: प्रो. हंसधर झा ने पंचांग, गणित और अद्वैत के वैज्ञानिक आधारों को रेखांकित किया।
संगोष्ठी की कुछ खास बातें
- प्रतिभागी: 100 से अधिक विद्वानों और शोधार्थियों का पंजीकरण।
- शोध पत्र: लोक परंपराओं और आदिवासी ज्ञान के संरक्षण पर 10 से अधिक महत्वपूर्ण शोध पत्र पढ़े गए।
- समन्वय: कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. नवनीत और डॉ. मधु प्रिया ने किया।

विशेषज्ञों के ‘ज्ञान सूत्र’
“भारतीय ज्ञान परंपरा ‘स्व’ के नैतिक विस्तार की बात करती है, जो इसे पाश्चात्य एलिनेशन (अलगाव) के सिद्धांतों से कहीं अधिक समृद्ध बनाती है।” — डॉ. मिथिलेश तिवारी
“आज युवा पीढ़ी भारतीय ज्ञान को तेजी से आत्मसात कर रही है, जो एक सुखद बदलाव का संकेत है।” — डॉ. रवि प्रकाश दुबे (कुलगुरु, RNTU)




