महाराष्ट्र में टीपू सुल्तान पर सियासी ‘महायुद्ध’: कांग्रेस ने BJP को दिखाया ‘पुराना प्यार’, फडणवीस का तीखा पलटवार

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drnewsindia.com

मुंबई: महाराष्ट्र की राजनीति में ‘टीपू सुल्तान’ एक बार फिर विवादों के केंद्र में हैं। मालेगांव मेयर कार्यालय में टीपू सुल्तान की तस्वीर लगाने से शुरू हुआ यह विवाद अब बीजेपी बनाम कांग्रेस की ‘पुरानी यादों’ और ‘राष्ट्रवाद’ की जंग में बदल गया है।

कांग्रेस का BJP पर ‘यू-टर्न’ का आरोप

कांग्रेस नेता सचिन सावंत ने सोशल मीडिया पर दस्तावेजों की झड़ी लगा दी है। उन्होंने बीजेपी पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाते हुए कुछ बड़े खुलासे किए:

  • पुराना प्रेम: सावंत के अनुसार, 2001 और 2013 में मुंबई में सड़कों का नाम ‘शहीद टीपू सुल्तान’ रखने का प्रस्ताव खुद बीजेपी नेताओं (ऋतु तावड़े, गोपाल शेट्टी) ने पेश किया था।
  • येडियुरप्पा का दौरा: कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येडियुरप्पा टीपू की मजार पर गए थे और प्रशंसा लिखी थी।
  • राष्ट्रपति का बयान: 2017 में तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी टीपू सुल्तान को नायक बताया था।
  • दावा: सचिन सावंत ने कहा, “पहले प्रेम था, अब ध्रुवीकरण के लिए टीपू सुल्तान बुरे हो गए?”

सत्ता पक्ष का आक्रोश: “जूते चाटने जैसी राजनीति”

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस मुद्दे पर बेहद कड़ा रुख अपनाया है। खासकर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल द्वारा टीपू सुल्तान की तुलना छत्रपति शिवाजी महाराज से किए जाने पर उन्होंने तीखा हमला किया।

“वोटों के लालच में कितने भी जूते चाटे, महाराष्ट्र छत्रपति शिवाजी महाराज से टीपू सुल्तान की तुलना कभी सहन नहीं करेगा।”देवेंद्र फडणवीस, मुख्यमंत्री

विवाद की मुख्य बातें: किसने क्या कहा?

नेताबयान का मुख्य बिंदु
असदुद्दीन ओवैसीटीपू सुल्तान अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हुए, उन्होंने सावरकर की तरह माफीनामे (लव लेटर) नहीं लिखे।
संजय निरुपमटीपू सुल्तान राष्ट्रपुरुष नहीं, बल्कि अपनी रियासत बचाने वाले शासक थे। मालेगांव कट्टरपंथियों का अड्डा बनता जा रहा है।
संजय राउततुलना तो गलत है, लेकिन टीपू को मानने वाले आधे लोग आज बीजेपी में ही बैठे हैं।
शाइना एन.सी.सरकारी दफ्तरों में सिर्फ अंबेडकर, गांधी और शिवाजी महाराज जैसे नायकों का सम्मान होना चाहिए।

निष्कर्ष: क्यों भड़की है आग?

यह विवाद केवल एक तस्वीर तक सीमित नहीं है। आगामी चुनावों और राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए, दोनों पक्ष ऐतिहासिक प्रतीकों के जरिए ध्रुवीकरण और अस्मिता की राजनीति को धार दे रहे हैं।

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