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राजगढ़ | मंगलवार को जहां पूरा देश चंद्रग्रहण के चलते शांत था, वहीं राजगढ़ जिले में ‘संवेदनाओं की होली’ ने सामाजिक एकजुटता की एक मिसाल पेश की। यहां रंग और गुलाल उत्सव मनाने के लिए नहीं, बल्कि उन जख्मों को भरने के लिए उठाए गए, जो बीते एक साल में किसी अपने के बिछड़ने से मिले थे।

🤝 शोक से शुभ की ओर: एक अनूठी परंपरा
राजगढ़ और खिलचीपुर सहित पूरे जिले में विभिन्न समाजों ने एक ऐसी परंपरा का निर्वहन किया जो केवल मालवा की माटी में ही देखने को मिलती है।
- मकसद: जिन परिवारों में बीते साल गमी (निधन) हुई थी, समाज के लोग उनके घर पहुंचे।
- संदेश: दुख की घड़ी अब बीत चुकी है। समाज ने शोकग्रस्त परिवारों को रंग लगाकर संदेश दिया कि अब वे पुनः खुशी के आयोजनों और शुभ कार्यों में शामिल हो सकते हैं।
📍 खिलचीपुर: समाजों ने निभाई अपनी जिम्मेदारी
खिलचीपुर क्षेत्र में सामाजिक समरसता का अद्भुत नजारा दिखा, जहां महिलाओं ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया:
| समाज | कितने परिवारों तक पहुंचे | विशेष भागीदारी |
| मालाकार समाज | 13 परिवार | समाज के अध्यक्ष और पंचों का नेतृत्व |
| स्वर्णकार समाज | 04 परिवार | महिलाओं की सक्रिय उपस्थिति |
| साहू समाज | 02 परिवार | घर-घर जाकर रंग अर्पित किया |
🙏 मर्यादा और शांति के साथ निभाई रस्म
आमतौर पर होली हुड़दंग का त्योहार माना जाता है, लेकिन राजगढ़ की यह होली पूरी तरह मर्यादित और शांत रही।
- समाज के अध्यक्षों के नेतृत्व में टोली बनाकर लोग उन घरों तक पहुंचे जहां मातम था।
- स्थानीय मान्यता के अनुसार, बुधवार को रंग नहीं डाला जाता, इसलिए मंगलवार को ही इस संवेदनशील रस्म को पूरा किया गया।
💡 परंपरा का महत्व: क्यों जरूरी है यह रस्म?
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, किसी परिवार में शोक होने के बाद आने वाली पहली होली पर जब तक समाज स्वयं जाकर रंग नहीं लगाता, तब तक वह परिवार किसी भी मंगल कार्य की शुरुआत नहीं करता। समाज का यह कदम उस परिवार को मानसिक संबल देता है कि “आप अकेले नहीं हैं, पूरा समाज आपके साथ है।”




