राजगढ़: संत हरिओम तत्सत महाराज की पुण्यतिथि पर उमड़ा श्रद्धा का सैलाब, समाधि स्थल पर हुआ चरण पादुका पूजन

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राजगढ़ | आस्था और भक्ति के केंद्र खोयरी मंदिर परिसर में सोमवार को महान संत श्री 1008 हरिओम तत्सत महाराज की पुण्यतिथि पूर्ण श्रद्धा के साथ मनाई गई। इस अवसर पर नगर सहित दूर-दराज के क्षेत्रों से आए हजारों श्रद्धालुओं ने संत की समाधि पर मत्था टेका और उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।

भक्तिमय रहा माहौल: भजन और कीर्तन से गूँजा परिसर

पुण्यतिथि के अवसर पर खोयरी स्थित समाधि स्थल को आकर्षक फूलों से सजाया गया था। सुबह से ही श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। कार्यक्रम के दौरान:

  • चरण पादुका पूजन: विशेष मंत्रोच्चार के साथ संत जी की चरण पादुकाओं का पूजन और अर्चना की गई।
  • भजन-कीर्तन: महिलाओं और सत्संग मंडलियों द्वारा प्रस्तुत भजनों से पूरा वातावरण आध्यात्मिक रंग में रंगा नजर आया।
  • शोभायात्रा: इससे पूर्व रविवार को नगर के प्रमुख मार्गों से भव्य ‘चरण पादुका शोभायात्रा’ निकाली गई थी, जिसमें भक्त झूमते-गाते शामिल हुए।

विशेष लेख: कौन थे संत हरिओम तत्सत महाराज?

संत जी का जीवन त्याग और तपस्या की एक अनूठी मिसाल रहा है। उनकी पुण्यतिथि पर उनके जीवन के ये पहलू आज भी श्रद्धा जगाते हैं:

मुख्य जानकारीविवरण
जन्म1 मार्च 1885 (जगन्नाथ त्रिपाठी जी के यहाँ)
शिक्षाकाशी में 12 वर्षों तक ज्योतिष और संस्कृत का अध्ययन
कठोर व्रत1931 से अन्न का त्याग किया, केवल एक बार फल और दूध का सेवन
आध्यात्मिक संकल्पआंखों की रोशनी जाने के बाद भी उपचार के बजाय ईश्वरीय इच्छा को सर्वोपरि माना

स्वयं तय की थी मोक्ष की तिथि

महाराज जी की आध्यात्मिक शक्ति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपने मोक्ष का समय और स्थान पहले ही घोषित कर दिया था। 28 दिसंबर 1968 को उन्होंने अनुयायियों को सूचित किया और अगले दिन 29 दिसंबर को खोयरी के जंगलों में साधना करते हुए वे ब्रह्मलीन हो गए।

धार्मिक धरोहर: पारायण चौक और गीता मानस प्रचार समिति

नगर के धार्मिक और सांस्कृतिक उत्थान में भी महाराज जी का योगदान अतुलनीय है। राजगढ़ का प्रसिद्ध पारायण चौक, जो आज सभी प्रमुख आयोजनों का केंद्र है, उसकी प्रेरणा संत हरिओम तत्सत जी ही थे। साथ ही, ‘गीता मानस प्रचार समिति’ के माध्यम से उन्होंने धर्म का प्रचार-प्रसार किया।

“महाराज जी का जीवन साक्षात सुशासन और तपस्या का प्रतीक था। आज भी उनकी समाधि पर आने वाले भक्तों को असीम शांति की अनुभूति होती है।” — अनुयायी, सत्संग मंडली

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