संगठन में दरार बनी रहेगी तो चुनावी मजबूती कैसे मिलेगी?

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भाजपा मध्य प्रदेश में जिला-संगठन को सुदृढ़ करने की कवायद में फंसी


मामला क्या है

Drnewsindia.com/Bharatiya Janata Party (भाजपा) मध्य प्रदेश में संगठन-विस्तार को लेकर चिंतित है। उस प्रदेश के 62 जिलों में से 38 की जिला कार्यकारिणी (जीवित-टीम) घोषित हो चुकी है, लेकिन 24 जिलों की कार्यकारिणी अब भी लंबित है।
मुख्य कारणों में – स्थानीय स्तर पर नामों को लेकर मतभेद, संगठनात्मक समीकरण व गुटबाजी, तथा सांसद–विधायकों के बीच समन्वय न बन पाना शामिल है।
प्रदेश अध्यक्ष Hemant Khandelwal ने तीन महीने पहले इस प्रक्रिया की शुरुआत की थी, लेकिन अपेक्षित गति नहीं दिखी है।


क्यों अटक रही है प्रक्रिया

  1. नामों पर मतभेद – जिन जिलों में कार्यकारिणी नहीं बनी, वहाँ नेताओं-कार्यालयियों के बीच नामांकन को लेकर असहमति पाई गई है।
  2. सांसद-विधायक समन्वय का अभाव – पार्टी सूत्रों के अनुसार कार्यकारिणी घोषित न कर पाने का एक कारण है सांसदों और विधायकों के बीच समन्वय का अभाव। जिला अध्यक्ष, विधान सभा क्षेत्र व लोकसभा क्षेत्र का संतुलन बनाना कठिन हो गया है।
  3. परिवारवाद व जमीनी असंतोष – कार्यकर्ताओं में यह शिकायत है कि पदों पर नियुक्तियों में पारिवारिक प्रभाव या रसूखधारियों को प्राथमिकता दी जा रही है। उदाहरणस्वरूप कुछ जिलों में ऐसे नाम सामने आए जिन पर खुलकर विरोध हुआ।
  4. प्रक्रिया-निर्णय में देरी – प्रदेश अध्यक्ष ने ऑब्जर्वर्स भेजे थे जो 15 अगस्त तक रिपोर्ट सौंप चुके थे। इसके बाद भी कई जिलों में सहमति नहीं बनी।

कहाँ अटकी स्थिति अधिक गंभीर है?

  • भोपाल जिले में: भोपाल-ग्रामीण की टीम बनी है, लेकिन भोपाल-शहर की कार्यकारिणी पर अभी सहमति नहीं बनी।
  • इंदौर जिले में: नगर की कार्यकारिणी घोषित हो गई है, पर इंदौर-ग्रामीण अधूरी है।
  • जबलपुर-शहर और सागर-शहर में भी सक्रिय नामांकन व संतुलन नहीं बन पाया।

पार्टी-रणनीति में क्या बदलाव हो रहा है?

  • संगठन विस्तार के लिए पार्टी ने युवाओं, महिलाओं, सामाजिक दृष्टि से विविध प्रतिनिधित्व पर विशेष ध्यान दिया है।
  • कार्यकर्ताओं की जमीनी पकड़ को महत्व दिया जा रहा है — सक्रिय, समय-समर्पित कार्यकर्ताओं को आगे लाया जा रहा है।
  • संगठन में नए पद बनाए गए हैं: जैसे ‘प्रदेश मोर्चा प्रभारी’, ‘प्रदेश प्रकोष्ठ प्रभारी’, ‘कार्यालय व्यवस्था प्रभारी’ आदि। पुराने संगठन महामंत्रियों को इन पदों पर एडजस्ट किया जा रहा है।
  • उदाहरण के लिए: शाजापुर के जिला अध्यक्ष श्याम टेलर को प्रदेश युवा मोर्चा का अध्यक्ष बनाया गया है (ओबीसी समाज से आते हैं) व महिला मोर्चा की कमान जबलपुर की अश्विनी परांजपे को दी गई है (ब्राह्मण समाज से) — जिससे जातीय-सामजिक संतुलन का प्रयास नजर आता है।

इससे क्या सीख मिलती है और क्या असर हो सकता है?

  • यदि जिला-स्तर की संगठनात्मक टीम समय पर नहीं बनती, तो भारी-भरकम मशीनरी समय पर चुनावी तैयारी नहीं कर पाएगी, जिसके कारण मैदान में कमजोरी रहने की संभावना है।
  • कार्यकर्ताओं की नाराजगी व नामांकन विवाद से भूमिगत असंतोष बढ़ सकता है, जिससे फील्डवर्क व बूथ-लेवल समन्वय प्रभावित हो सकता है।
  • नए पद व प्रतिनिधित्व-संतुलन अच्छा संकेत है, लेकिन यह तभी सुव्यवस्थित होगा जब सामाजिक विश्वासप्रक्रिया-पारदर्शिता बनी रहे।
  • संगठनकारियों और सांसद-विधायकों के बीच बेहतर समन्वय-मैकेनिज्म विकसित करना होगा, ताकि निर्णय जल्दी हो सकें और टीम-निर्माण समय पर संपन्न हो।

प्रदेश भाजपा के लिए यह समय-संकट है कि जिला कार्यकारिणी-मेकिंग की प्रक्रिया लंबित है और इससे संगठनात्मक मजबूती पर असर पड़ सकता है। नामांकन-विवाद, समन्वय-घाट, सामाजिक संतुलन की चुनौतियाँ इसके मूल में हैं। हालांकि पार्टी ने नए प्रतिनिधित्व व पदरचना के माध्यम से बदलाव की दिशा में कदम उठाए हैं, लेकिन असली परीक्षा यह होगी कि कब और कैसे ये 24 जिलों की अधूरी कार्यकारिणियाँ पूरी होंगी। समय पर टीम बनना, कार्यकर्ताओं का विश्वास जीतना और समन्वय स्थापित करना अब प्राथमिकता बन गया है।


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