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नई दिल्ली/भोपाल: संसद के बजट सत्र के दौरान केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने देश के अन्नदाताओं की आर्थिक स्थिति पर ताजा आंकड़े पेश किए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश का किसान कर्ज के मामले में राष्ट्रीय औसत के बेहद करीब है, लेकिन पड़ोसी राज्य राजस्थान की तुलना में काफी बेहतर स्थिति में है।

कर्ज का गणित: मध्य प्रदेश बनाम अन्य राज्य
संसद में पेश आंकड़ों के अनुसार, प्रति कृषक परिवार औसत बकाया ऋण की स्थिति कुछ इस प्रकार है:
| राज्य/क्षेत्र | औसत बकाया कर्ज (प्रति परिवार) |
| मध्य प्रदेश | ₹74,420 |
| राष्ट्रीय औसत | ₹74,121 |
| राजस्थान | ₹1,13,865 |
| छत्तीसगढ़ | ₹21,443 |
| दक्षिण भारत | सबसे अधिक कर्जदार राज्य |
बड़ी बात: जहां दक्षिण भारतीय राज्यों में कर्ज का बोझ सबसे ज्यादा है, वहीं मध्य प्रदेश ने इसे राष्ट्रीय औसत के पास नियंत्रित रखा है।
KCC का आंकड़ा 10 लाख करोड़ के पार
कृषि मंत्री ने सदन को बताया कि 30 सितंबर 2025 की स्थिति तक देश में किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) के तहत कुल बकाया राशि ₹10.39 लाख करोड़ पर पहुंच गई है। यह दर्शाता है कि किसान खेती में निवेश के लिए संस्थागत ऋण पर अधिक निर्भर हो रहे हैं।
‘किसान कल्याण वर्ष 2026’: एमपी सरकार का मास्टर प्लान
बढ़ते कर्ज को देखते हुए मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व वाली सरकार ने वर्ष 2026 को ‘किसान कल्याण वर्ष’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। इसके तहत प्रमुख कदम ये हैं:
- शून्य ब्याज योजना: जून 2026 तक किसानों को 0% ब्याज पर फसल ऋण मिलता रहेगा।
- ब्याज अनुदान: समय पर कर्ज चुकाने वाले किसानों को 4% अतिरिक्त ब्याज सब्सिडी का लाभ।
- डिफॉल्टरों की वापसी: सहकारी बैंकों के डिफॉल्टर किसानों को राहत देकर दोबारा बैंकिंग सिस्टम से जोड़ना।
- सिंचाई क्रांति: नर्मदा-क्षिप्रा लिंक जैसी परियोजनाओं से खेती को ‘लाभ का धंधा’ बनाने की कोशिश।
विशेषज्ञों की राय
हालांकि KCC किसानों की निवेश क्षमता बढ़ा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और फसल बीमा का लाभ जमीनी स्तर पर नहीं मिलता, तब तक प्राकृतिक आपदाओं के कारण यह कर्ज किसानों के लिए बोझ बना रहेगा।




