सिंधिया के शरणार्थी अब सियासी सन्नाटे में: सत्ता परिवर्तन के सूत्रधार आज बेपद-बेअसर

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Drnewsindia.com | भोपाल

कभी कांग्रेस की सत्ता में प्रभावशाली और निर्णायक भूमिका निभाने वाले ग्वालियर-चंबल संभाग के वे चेहरे, जिन्होंने केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ भाजपा का दामन थामा था और कमलनाथ सरकार की विदाई व शिवराज सरकार की वापसी में अहम किरदार निभाया था, आज राजनीतिक सन्नाटे में हैं।

पांच साल पहले जो नेता सत्ता परिवर्तन के सूत्रधार माने जाते थे, वे अब न भाजपा संगठन में सक्रिय हैं, न सरकार में किसी पद पर। इनकी पहचान और प्रभाव दोनों सिमट चुके हैं। सिंधिया के ‘शरणार्थी’ कहे जाने वाले ये नेता अब राजनीतिक पुनर्वास की प्रतीक्षा में हैं — उम्मीद सिर्फ़ श्रीमंत की अनुशंसा पर टिके पद की है।

भाजपा की नई प्राथमिकताएं, संघ की कसौटी और नए चेहरों का उभार इनकी राह और कठिन बना रहे हैं। कभी सियासत की पहली पंक्ति में खड़े रहे ये नाम अब पार्टी के लिए अप्रासंगिक माने जा रहे हैं।


सियासी हाशिए पर प्रमुख चेहरे

  • महेंद्र सिंह सिसोदिया (बमोरी, गुना) – 2023 में चुनाव हारे, संगठन में न कोई पद, न दायित्व।
  • ओपीएस भदौरिया (मेहगांव, भिंड) – उपचुनाव जीते, लेकिन 2023 में टिकट काटा गया, फिलहाल निष्क्रिय।
  • गिर्राज कंसाना (दिमनी, मुरैना) – उपचुनाव में पराजित, अब टिकट नरेंद्र सिंह तोमर को मिला।
  • मुन्नालाल गोयल (ग्वालियर) – उपचुनाव हारे, 2023 में टिकट माया सिंह को दिया गया।
  • इमरती देवी (डबरा, ग्वालियर) – दो चुनावों में हार, अब संगठन में कोई भूमिका नहीं।
  • रक्षा सिरोनिया (भांडेर, दतिया) – उपचुनाव में हार के बाद टिकट लालसिंह आर्य को मिला।

कितने जीते, कितने हारे

  • कुल 22 विधायक सिंधिया के साथ कांग्रेस से भाजपा में आए थे।
  • इनमें से 6-7 ने चुनाव जीतकर वापसी की, जबकि 15-16 नेता आज सत्ता और संगठन दोनों से बाहर हैं।
  • प्रारंभिक दौर में कुछ को निगम-मंडलों में पद जरूर मिले, पर वह चरण भी अब समाप्त हो चुका है।

गुमनामी के कारण

  • भाजपा में आंतरिक प्रतिस्पर्धा और नए चेहरों का उभार।
  • संघ-प्रधान क्षेत्रों में बाहरी नेताओं की सीमित स्वीकार्यता
  • सिंधिया की अनुशंसा शक्ति का कमजोर पड़ना
  • लगातार चुनावी पराजयों से विश्वसनीयता में गिरावट।

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