सिराड़ी के संगम घाट पर तीन दिवसीय मेले का भव्य समापन: रावण दहन के साथ उमड़ा जनसैलाब

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श्यामपुर/सिराड़ी: मकर संक्रांति के पावन अवसर पर श्यामपुर क्षेत्र के ऐतिहासिक सिराड़ी गांव स्थित त्रिवेणी संगम घाट पर आयोजित तीन दिवसीय पारंपरिक मेला शुक्रवार को हर्षोल्लास के साथ संपन्न हुआ। मेले के अंतिम दिन राम-रावण युद्ध का जीवंत मंचन और रावण के पुतले का दहन मुख्य आकर्षण रहा, जिसे देखने के लिए हजारों की संख्या में श्रद्धालु और ग्रामीण एकत्रित हुए।

आस्था और परंपरा का अनूठा संगम

बुधवार से शुरू हुए इस उत्सव में पूरे तीन दिनों तक क्षेत्र में भक्ति और उत्साह का माहौल रहा। सिराड़ी का यह संगम घाट अपनी प्राचीनता और धार्मिक महत्व के लिए जाना जाता है। मेले के समापन अवसर पर:

  • पवित्र स्नान: श्रद्धालुओं ने सुबह से ही त्रिवेणी संगम में डुबकी लगाकर विशेष पूजा-अर्चना की।
  • सजावट: आयोजन समिति द्वारा नदी घाट और आसपास के मंदिरों को आकर्षक फूलों और लाइटों से सजाया गया था।
  • सांस्कृतिक प्रस्तुतियां: स्थानीय कलाकारों द्वारा रामलीला के मंचन ने दर्शकों का मन मोह लिया।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था और मनोरंजन

मेला न केवल आस्था का केंद्र रहा, बल्कि स्थानीय व्यापारियों और बच्चों के लिए भी खुशियां लेकर आया। मेले के मुख्य आकर्षण रहे:

  1. झूले और खिलौने: बच्चों के लिए विभिन्न प्रकार के झूले और खिलौनों की दुकानों पर भारी भीड़ देखी गई।
  2. खान-पान: स्थानीय व्यंजनों और मिठाई के स्टॉल्स पर लोगों ने जमकर आनंद लिया।
  3. राम-रावण युद्ध: अंतिम दिन के मंचन के बाद जैसे ही रावण के पुतले का दहन हुआ, पूरा क्षेत्र “जय श्रीराम” के उद्घोष से गूंज उठा।

90 वर्षों की विरासत: मांग अब भी अधूरी

मेले के संयोजक नंदकिशोर पुरी ने बताया कि यह मेला करीब 90 वर्षों से अनवरत आयोजित किया जा रहा है और यह इस क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर बन चुका है।

हालांकि, इस भव्यता के बीच सुविधाओं का अभाव भी चर्चा का विषय रहा। ग्रामीण लक्ष्मण सिंह दांगी ने बताया कि:

“यह स्थल धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन यहां तक पहुंचने का मार्ग आज भी जर्जर और खराब है। शासन और स्थानीय जनप्रतिनिधियों को इस ओर ध्यान देना चाहिए ताकि श्रद्धालुओं को भविष्य में परेशानी न हो।”

मुख्य जानकारीविवरण
स्थानसिराड़ी गांव, त्रिवेणी संगम घाट (श्यामपुर)
अवधितीन दिवसीय (बुधवार से शुक्रवार)
मुख्य कार्यक्रमराम-रावण युद्ध मंचन एवं रावण दहन
इतिहासलगभग 90 वर्षों से निरंतर आयोजन
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