खिलचीपुर गोशाला मामला: 3 गायों की मौत के बाद विभाग सख्त, क्षमता से अधिक गोवंश और कुप्रबंधन का खुलासा

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Drnewsindia.com

राजगढ़ | खिलचीपुर स्थित श्रीकृष्ण गोशाला में तीन गायों की मौत और बदहाल व्यवस्थाओं की खबरें सामने आने के बाद पशुपालन विभाग ने बड़ी कार्रवाई शुरू की है। विभाग के उपसंचालक डॉ. प्रवीण कुमार दीक्षित द्वारा गठित तीन सदस्यीय जांच दल ने शनिवार को गोशाला का औचक निरीक्षण किया।

निरीक्षण में सामने आईं मुख्य खामियां

जांच टीम (डॉ. मान सिंह बामनिया, डॉ. सोनाली ठाकुर और डॉ. मधुसूदन शाक्य) और अतिरिक्त उपसंचालक डॉ. ममता दीक्षित ने निरीक्षण के दौरान निम्नलिखित गंभीर बिंदु नोट किए:

  • ओवरक्राउडिंग: गोशाला में 595 गोवंश पाए गए, जो इसकी वास्तविक क्षमता से बहुत अधिक हैं।
  • बीमार गोवंश: मौके पर 5 गोवंश बीमार मिले। नियमानुसार इन्हें अलग रखा जाना चाहिए, लेकिन ये अन्य जानवरों के साथ ही थे।
  • बछड़ों की सुरक्षा: छोटे बछड़े बड़े जानवरों के बीच पाए गए, जिससे उनके दबकर घायल होने या मरने की आशंका बनी रहती है।
  • हाइजीन और पानी: हालांकि भूसा पर्याप्त मिला, लेकिन पानी की टंकियां लंबे समय से साफ नहीं की गई थीं।
  • कुत्तों का आतंक: परिसर में आवारा कुत्तों की मौजूदगी पाई गई, जो बीमार और कमजोर गायों के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं।

डॉ. ममता दीक्षित (अतिरिक्त उपसंचालक) का कथन: “क्षमता से अधिक गोवंश होने के कारण प्रबंधन प्रभावित हो रहा है। मृत गोवंश को कुत्तों द्वारा नोचे जाने की घटना बेहद गंभीर है, जिसकी औपचारिक जांच रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई की जाएगी।”


गोशाला अध्यक्ष का बचाव: “व्यवस्थाएं पूरी, पर डॉक्टरों का अभाव”

गोशाला के अध्यक्ष दिनेश पंचोली ने कुप्रबंधन के आरोपों को खारिज किया है। उनका पक्ष इस प्रकार है:

  1. संसाधन: चारा और पानी की पर्याप्त व्यवस्था है और रात में चौकीदार तैनात रहते हैं।
  2. सुरक्षा: कुत्तों की समस्या को स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा कि सुरक्षा के इंतजाम किए जा रहे हैं।
  3. इलाज का मुद्दा: पंचोली ने डॉक्टरों पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि बुलाने पर विशेषज्ञ समय का हवाला देकर नहीं आते। फिलहाल इलाज का जिम्मा विभाग के एक परिचालक (कमल मालाकार) के भरोसे है।

आगे क्या?

पशुपालन विभाग की जांच टीम अपनी विस्तृत रिपोर्ट उच्चाधिकारियों को सौंपेगी। रिपोर्ट में यह तय किया जाएगा कि गोशाला प्रबंधन की लापरवाही कितनी थी और क्या सरकारी डॉक्टरों की ओर से इलाज में कोताही बरती गई।

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