2028 विधानसभा चुनाव से पहले ही तेज हुई सियासी जंग
Drnewsindia.com/भोपाल | विशेष रिपोर्ट
मध्यप्रदेश में भले ही विधानसभा चुनाव अभी 2028 में होने हैं, लेकिन सियासी हलचल अभी से तेज हो गई है। भाजपा और कांग्रेस के बीच जमीन से लेकर सोशल मीडिया तक सियासी वॉर छिड़ चुका है। जिस तरह दोनों दलों की रणनीति और बयानबाजी सामने आ रही है, उससे साफ है कि अगले तीन साल तक प्रदेश में लगातार चुनावी रार देखने को मिलेगी।
सबसे खास बात यह है कि मध्यप्रदेश की राजनीति पर अब सिर्फ भोपाल ही नहीं, बल्कि दिल्ली से भी नजर रखी जा रही है। दोनों राष्ट्रीय दलों का शीर्ष नेतृत्व प्रदेश की हर बड़ी राजनीतिक गतिविधि की मॉनिटरिंग कर रहा है।
भाजपा सरकार बचाने में, कांग्रेस वापसी की तैयारी में
भाजपा लगातार सत्ता में बने रहने की रणनीति पर काम कर रही है, जबकि कांग्रेस सत्ता में वापसी की कोशिश में जुटी है। इसी वजह से प्रदेश के छोटे-बड़े मुद्दों पर भी दिल्ली में बैठे पार्टी हाईकमान की नजर है।
कांग्रेस दूषित पानी जैसे मुद्दों को छोड़ने के मूड में नहीं है, वहीं भाजपा सरकार ऐसे मुद्दों को “सेफ जोन” में ले जाने की रणनीति पर काम कर रही है, ताकि सरकार को किसी बड़े राजनीतिक नुकसान से बचाया जा सके।
अलग-अलग मुद्दों पर कांग्रेस का सरकार पर हमला
पिछले कुछ महीनों से कांग्रेस लगातार सरकार और भाजपा को अलग-अलग मुद्दों पर घेर रही है। छिंदवाड़ा सिरप कांड में कांग्रेस ने सरकार को घेरने की पूरी कोशिश की, लेकिन भाजपा और प्रदेश सरकार ने इस मुद्दे को ज्यादा तूल नहीं पकड़ने दिया।
अब कांग्रेस इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतों के मामले को बड़ा मुद्दा बनाने में जुटी है। भाजपा नेताओं का कहना है कि संगठन को पता है कि कांग्रेस इस मुद्दे को लंबे समय तक जिंदा रखना चाहती है। इसी वजह से भाजपा का शीर्ष नेतृत्व इस मामले में बड़े फैसले लेने की तैयारी में है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने खुद मोर्चा संभालते हुए लोगों को भरोसा दिलाया है कि सरकार हर समस्या का समाधान करेगी। सूत्रों के मुताबिक, भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व इस पूरे मामले में मुख्यमंत्री से लगातार फीडबैक ले रहा है। घटना के तुरंत बाद अधिकारियों पर की गई कार्रवाई से प्रदेशभर में सकारात्मक संदेश गया है। आने वाले समय में सरकार और पार्टी कुछ और कदम उठा सकती है, जिससे विपक्ष को इस मुद्दे पर कमजोर किया जा सके।
17 जनवरी को इंदौर में कांग्रेस का बड़ा प्रदर्शन
इधर कांग्रेस दूषित पानी के मुद्दे को बड़े आंदोलन में बदलने की तैयारी में है। बताया जा रहा है कि यह फैसला केंद्रीय नेतृत्व के निर्देश पर लिया गया है। राहुल गांधी का इंदौर दौरा भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
छिंदवाड़ा जैसी घटनाओं में राहुल गांधी का दौरा नहीं हुआ, लेकिन इंदौर मामले को बड़ा मुद्दा बनाने के लिए उनका इंदौर आना कांग्रेस की गंभीरता दिखाता है। पार्टी नेताओं का मानना है कि दूषित पानी का मुद्दा सीधे आम जनता से जुड़ा है, खासकर उस वर्ग से जो निम्न आय वर्ग में आता है और हाल के चुनावों में कांग्रेस से दूर होता गया है।
कांग्रेस का मानना है कि इस मुद्दे को लंबे समय तक जिंदा रखकर वह इस वर्ग को फिर से अपने पाले में ला सकती है। इसी रणनीति के तहत कांग्रेस ने प्रदेश के हर वार्ड में “वॉटर ऑडिट” कराने की मुहिम शुरू की है। यह अभियान लंबे समय तक चलेगा, जिससे मुद्दा भी लंबे समय तक सियासत के केंद्र में बना रहेगा।
“राजनीति नहीं, जनता के हक की लड़ाई” – कांग्रेस
हालांकि कांग्रेस के कुछ नेता इस मुद्दे को बेहद संवेदनशील बताते हुए कहते हैं कि पार्टी सिर्फ राजनीतिक फायदा लेने के लिए मैदान में नहीं उतरी है, बल्कि जनता को न्याय दिलाने और स्वच्छ जल उपलब्ध कराने के लिए सरकार से लड़ रही है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी का कहना है कि कांग्रेस हमेशा जनता से जुड़े मुद्दों को उठाती रही है। वहीं पार्टी नेता ब्लॉक स्तर पर मनरेगा योजना का नाम बदलने के विरोध में भी केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ अभियान चलाने की तैयारी में हैं।
अगले तीन साल तक गरम रहेगी राजनीति
भाजपा सत्ता बचाने की लड़ाई में है और कांग्रेस सत्ता में लौटने की। ऐसे में मुद्दे कोई भी हों—पानी, स्वास्थ्य, रोजगार या योजनाएं—हर विषय अब राजनीति का हथियार बनेगा। यही वजह है कि 2028 के चुनाव से पहले ही मध्यप्रदेश में अगले तीन साल तक सियासी गर्मी बनी रहना तय माना जा रहा है।




