दिग्गी राजा का इंकार… अब सक्रिय हुए दावेदार

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दिग्विजय सिंह के फैसले से मप्र कांग्रेस में राज्यसभा को लेकर घमासान

Drnewsindia.com/भोपाल | राजनीतिक डेस्क

मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने ऐलान किया है कि वे तीसरी बार राज्यसभा नहीं जाएंगे। उन्होंने कहा है कि वे अपनी सीट किसी नए चेहरे के लिए छोड़ना चाहते हैं। दिग्विजय सिंह का यह फैसला सामने आते ही प्रदेश कांग्रेस में हलचल तेज हो गई है और एक ही राज्यसभा सीट को लेकर दावेदारों की लंबी कतार लग गई है।

हालांकि, सीट छोड़ने के साथ ही दिग्विजय सिंह ने ऐसा बयान भी दे दिया, जिसने सियासत को नया मोड़ दे दिया। उन्होंने कहा कि यदि कभी अनुसूचित जाति या जनजाति का मुख्यमंत्री बनता है तो उन्हें खुशी होगी। इस बयान के बाद पार्टी में यह चर्चा तेज हो गई है कि राज्यसभा की यह सीट भी कहीं एससी-एसटी वर्ग के खाते में न चली जाए।

9 अप्रैल को खाली होंगी दो राज्यसभा सीटें

मध्यप्रदेश में कुल 11 राज्यसभा सीटें हैं। इनमें से 9 अप्रैल को दो सीटें खाली होंगी—एक कांग्रेस के दिग्विजय सिंह की और दूसरी भाजपा के डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी की।
230 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा के 164, कांग्रेस के 65 और एक निर्दलीय विधायक हैं। इस गणित के हिसाब से कांग्रेस को एक सीट मिलना तय माना जा रहा है। दिग्विजय सिंह का कार्यकाल 9 अप्रैल को खत्म हो रहा है और उन्होंने साफ कर दिया है कि वे दोबारा राज्यसभा जाने के इच्छुक नहीं हैं।

सोशल मीडिया से लेकर दिल्ली तक दावेदारी

दिग्विजय सिंह के बयान के बाद कांग्रेस नेताओं के समर्थक सोशल मीडिया पर पूरी तरह सक्रिय हो गए हैं। फेसबुक, एक्स (ट्विटर), इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप ग्रुपों में अपने-अपने नेताओं के समर्थन में पोस्ट, वीडियो और उपलब्धियों की सूची साझा की जा रही है।
हर खेमा यह दिखाने में जुटा है कि उसका नेता पार्टी के लिए सबसे उपयुक्त और उपयोगी साबित होगा। इससे साफ है कि यह लड़ाई सिर्फ वरिष्ठता की नहीं, बल्कि जातिगत संतुलन और संगठनात्मक मजबूती की भी है।

“कम से कम राज्यसभा तो मिले”

कांग्रेस के अनुसूचित विभाग के अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने दिग्विजय सिंह को पत्र लिखकर कहा है कि जब आप एससी-एसटी वर्ग के मुख्यमंत्री की बात कर रहे हैं, तो कम से कम राज्यसभा में तो इसी वर्ग को प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
इसी के साथ कांग्रेस के भीतर अंदरूनी घमासान और तेज हो गया है।

दिग्विजय सिंह पहले भी अपने बयानों से पार्टी में हलचल पैदा करते रहे हैं—चाहे सीडब्ल्यूसी बैठक में आरएसएस पर बयान हो या मध्यप्रदेश में एससी-एसटी मुख्यमंत्री की वकालत। इससे पहले दिग्विजय सिंह और प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी की अलग-अलग पदयात्राओं के दौरान भी गुटबाजी की चर्चाएं हुई थीं।

तीन बड़े नाम सबसे आगे

राज्यसभा की इस सीट को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा तीन नामों की है—

1. कमलनाथ – वरिष्ठ नेता, फिलहाल छिंदवाड़ा से विधायक। केंद्र की राजनीति में लंबा अनुभव है। राज्यसभा के जरिए वे फिर दिल्ली की राजनीति में सक्रिय हो सकते हैं।

2. अरुण यादव – ओबीसी नेता और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष। पिछली बार उनके नाम पर चर्चा हुई थी लेकिन मौका नहीं मिला। इस बार वे मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं।

3. जीतू पटवारी – वर्तमान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष। विधानसभा चुनाव हार चुके हैं, लेकिन मेहनती और राहुल गांधी के करीबी माने जाते हैं। राज्यसभा जाने से उनकी राजनीतिक हैसियत और मजबूत हो सकती है।

और भी दावेदार मैदान में

इन तीनों के अलावा पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन, पूर्व मंत्री कमलेश्वर पटेल और सज्जन सिंह वर्मा भी दावेदारी कर रहे हैं। सज्जन वर्मा के समर्थक सोशल मीडिया पर लगातार पोस्ट डाल रहे हैं।
नरेला से विधानसभा प्रत्याशी रहे महेंद्र सिंह चौहान ने भी सोशल मीडिया के जरिए खुद को दावेदार बताया है।

पार्टी नेतृत्व के लिए बड़ी चुनौती

दिग्विजय सिंह के फैसले से यह साफ हो गया है कि कांग्रेस के पास राज्यसभा के लिए कई मजबूत चेहरे हैं, लेकिन यही बात पार्टी नेतृत्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती भी बन गई है।
पार्टी को ऐसा नाम चुनना होगा जो संगठन को मजबूत करे, जातिगत संतुलन साधे और मिशन-2028 की रणनीति में फिट बैठे।

मिशन-2028 की तैयारी में दिग्गी राजा

दिग्विजय सिंह का राज्यसभा छोड़ने का फैसला सिर्फ निजी निर्णय नहीं माना जा रहा। इसे पार्टी में नई पीढ़ी को आगे लाने और नेतृत्व में बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
माना जा रहा है कि दिग्विजय सिंह अब मिशन-2028 के तहत पूरे प्रदेश में सक्रिय होकर संगठन को मजबूत करने में जुटेंगे।

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