जनसुनवाई में दिव्यांग ने आत्मदाह की कोशिश की, नगर सैनिक की सूझबूझ से टला हादसा

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drnewsindia/विदिशा |

विदिशा कलेक्ट्रेट में आयोजित जनसुनवाई के दौरान मंगलवार को उस वक्त हड़कंप मच गया, जब एक दिव्यांग फरियादी ने अपनी शिकायत से निराश होकर खुद को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की। मौके पर मौजूद नगर सैनिक की तत्परता से बड़ा हादसा टल गया।

दिव्यांग ज्ञान सिंह अपनी जाति प्रमाण-पत्र संबंधी समस्या लेकर जनसुनवाई में पहुंचे थे। उनका आरोप है कि वर्ष 2024 में बना उनका अनुसूचित जाति/जनजाति प्रमाण-पत्र बाद में निरस्त कर दिया गया और नया प्रमाण-पत्र अब तक नहीं बन पा रहा है। इसी परेशानी से आहत होकर उन्होंने जनसुनवाई के दौरान अत्यधिक भावुक कदम उठाने की कोशिश की, लेकिन नगर सैनिक तरुण दुबे ने तुरंत हस्तक्षेप कर स्थिति संभाल ली।

“न्याय नहीं मिल रहा” – फरियादी की पीड़ा

घटना के समय ज्ञान सिंह बार-बार यह कह रहे थे कि उन्हें लंबे समय से न्याय नहीं मिल रहा है। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, वे काफी समय से पटवारी, तहसील और अन्य दफ्तरों के चक्कर काट रहे थे, लेकिन उनकी समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा था।

पथरिया, सिरोंज तहसील निवासी 26 वर्षीय ज्ञान सिंह सहरिया आदिवासी समुदाय से हैं। उन्होंने बताया कि फरवरी 2024 में उन्हें स्थायी जाति प्रमाण-पत्र जारी हुआ था, लेकिन बाद में उसे निरस्त कर दिया गया। इसके बाद से वे नया प्रमाण-पत्र बनवाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं।

आवास योजना भी अटकी

प्रमाण-पत्र न होने के कारण ज्ञान सिंह को प्रधानमंत्री जन-मन योजना के तहत मिलने वाली आवास राशि भी नहीं मिल पा रही है। उनका आधा बना मकान अधूरा पड़ा है और वे पत्नी व बच्चों के साथ झोपड़ी में रहने को मजबूर हैं।

उन्होंने बताया कि अधिकारी उनके पिता का जाति प्रमाण-पत्र मांग रहे हैं, जबकि उनके पिता का निधन हो चुका है और उनके पास वह दस्तावेज नहीं है। चाचा का प्रमाण-पत्र होने के बावजूद उसे मान्य नहीं किया जा रहा।

प्रशासन ने दिया समाधान का भरोसा

एडीएम अनिल डामोर ने बताया कि जनसुनवाई में ज्ञान सिंह की बात सुनी गई है और जाति प्रमाण-पत्र के लिए लोकसेवा केंद्र में दोबारा आवेदन भी करवा दिया गया है। नियमों के तहत प्रमाण-पत्र बनवाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।

पहले भी हो चुकी हैं ऐसी घटनाएं

दिसंबर 2025 में विदिशा कलेक्ट्रेट की जनसुनवाई में ऐसी तीन घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जब फरियादी अपनी समस्याओं से टूटकर गलत कदम उठाने की कगार पर पहुंच गए थे। इन घटनाओं ने प्रशासन और समाज दोनों के सामने यह सवाल खड़ा किया है कि शिकायतों के त्वरित और संवेदनशील समाधान की कितनी जरूरत है।

यह घटना एक बार फिर बताती है कि समय पर सुनवाई और मानवीय दृष्टिकोण से समाधान न मिलने पर लोग किस हद तक टूट सकते हैं। गनीमत रही कि इस बार एक सजग नगर सैनिक की वजह से बड़ी अनहोनी टल गई।

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