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कोठरी/आष्टा | 23 जनवरी 2026 सरकार कागजों पर ‘पढ़ेगा इंडिया, बढ़ेगा इंडिया’ के बड़े-बड़े दावे करती है, करोड़ों का बजट पानी की तरह बहाया जाता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत इसके उलट है। आष्टा जनपद के शासकीय हाई स्कूल निपानिया कला से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जो शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। यहाँ नौनिहाल क्लासरूम में पढ़ाई शुरू करने से पहले पसीना बहाकर साफ-सफाई करने को मजबूर हैं।
⚠️ कड़वा सच: “यह हमारा रोज़ का काम है”
स्कूल परिसर में जब छात्राएं हाथों में झाड़ू लेकर सफाई करती दिखीं, तो पूछने पर मासूमियत भरा लेकिन झकझोर देने वाला जवाब मिला— “यह हमारा रोज का काम है।”
शिक्षकों की मौजूदगी में बच्चे अपनी ड्रेस गंदी कर स्कूल की झाड़-पोछ करते हैं, जिससे उनके मन में शिक्षा के प्रति उत्साह की जगह मोहभंग होने की आशंका बढ़ गई है।
प्रशासन का तर्क: न चपरासी है, न सफाईकर्मी
जब इस बदहाली पर स्कूल प्रबंधन से बात की गई, तो चौंकाने वाली कमियां सामने आईं:
- नियमित सफाई का अभाव: स्कूल में सफाई कर्मचारी सप्ताह में केवल एक दिन आता है।
- प्यून (Peon) का पद खाली: स्कूल में कोई चपरासी नहीं है, जिससे पानी भरने से लेकर सफाई तक का जिम्मा बच्चों पर आ गया है।
- प्राचार्य का पक्ष: प्राचार्य विष्णु शर्मा ने स्वीकार किया कि स्कूल में 103 बच्चे दर्ज हैं, लेकिन संसाधनों की कमी के कारण बच्चों को बारी-बारी से कक्षाओं की सफाई करनी पड़ती है।
करोड़ों का बजट… फिर भी हाल बेहाल क्यों?
सरकार बच्चों को मुफ्त किताबें, ड्रेस, जूते और मध्यान्ह भोजन तो दे रही है, लेकिन स्कूल की बुनियादी व्यवस्था (साफ-सफाई) के लिए कोई ठोस इंतजाम नहीं है।
- क्या बच्चों को स्कूल इसलिए भेजा जाता है कि वे वहां मजदूरी करें?
- क्या बाल शिक्षा अधिकार (RTE) का यह खुला उल्लंघन नहीं है?
“आपके माध्यम से यह जानकारी मुझे प्राप्त हुई है। मैं मामले की जांच करवाकर नियमानुसार उचित कार्रवाई करूंगी।” — सलोनी शर्मा, ब्लॉक शिक्षा अधिकारी, आष्टा
जनता का सवाल
जब स्कूल का भवन करोड़ों की लागत से बन सकता है, तो एक नियमित सफाईकर्मी या प्यून की नियुक्ति क्यों नहीं की जा सकती? जिम्मेदार अधिकारी क्यों ‘मूकदर्शक’ बने हुए हैं? यदि बच्चों का आधा समय सफाई में ही बीतेगा, तो वे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे प्राप्त करेंगे?




