drnewsindiaप्रयागराज (उत्तर प्रदेश)
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 1982 के एक हत्या मामले में करीब 100 वर्षीय धामी राम को बाइज्जत बरी कर दिया है। इस फैसले के साथ ही 42 वर्षों से चली आ रही उनकी लंबी और पीड़ादायक कानूनी लड़ाई का अंत हो गया। धामी राम को निचली अदालत द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा को उन्होंने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
इस मामले की सुनवाई जस्टिस चंद्रधारी सिंह और जस्टिस संजीव कुमार की डिवीजन बेंच ने की। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। साथ ही अपील के निपटारे में हुई अत्यधिक देरी और आरोपी की अधिक उम्र को भी ध्यान में रखा गया।
कोर्ट की अहम टिप्पणी
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि
- दशकों तक चली कानूनी प्रक्रिया ने आरोपी को मानसिक, सामाजिक और पारिवारिक रूप से गंभीर नुकसान पहुंचाया।
- लंबे समय तक चली अनिश्चितता, तनाव और सामाजिक परिणामों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
- ऐसे मामलों में न्याय में देरी स्वयं एक बड़ी पीड़ा बन जाती है।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि चूंकि धामी राम पहले से जमानत पर थे, इसलिए उनका जमानत बॉन्ड समाप्त किया जाए।
42 साल की कानूनी लड़ाई
धामी राम पर 1982 में हत्या का आरोप लगा था। इसके बाद उन्होंने कई साल जेल में बिताए और शेष जीवन अदालतों के चक्कर लगाते हुए गुजारा। करीब 100 साल की उम्र में मिला यह फैसला उनके लिए राहत भरा जरूर है, लेकिन यह न्यायिक व्यवस्था में देरी पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
यह मामला एक बार फिर दिखाता है कि न्याय में देरी, न्याय से वंचित करने के बराबर होती है।




