दर्शन शास्त्र से थमेगा पर्यावरणीय संकट: रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय में ‘वर्ल्ड फिलॉसफी डे’ पर विशेष कार्यशाला

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भोपाल | 31 मार्च, 2026

रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के योग विभाग द्वारा ‘वर्ल्ड फिलॉसफी डे’ के उपलक्ष्य में एक दिवसीय कार्यशाला का भव्य आयोजन किया गया। इस वर्ष कार्यक्रम की मुख्य थीम “पर्यावरणीय संकट को रोकने में दर्शन शास्त्र की भूमिका” रखी गई, जिसमें विशेषज्ञों ने प्रकृति और मानव के बीच बढ़ते असंतुलन पर गहन दार्शनिक विचार साझा किए।


✨ कार्यक्रम की मुख्य झलकियां

  • शुभारंभ: दीप प्रज्वलन और योग विभागाध्यक्ष डॉ. रत्नेश पाण्डेय के स्वागत उद्बोधन के साथ कार्यक्रम शुरू हुआ।
  • दर्शन का महत्व: डॉ. पाण्डेय ने बताया कि दर्शन शास्त्र केवल किताबी विषय नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक पद्धति है जो हमें प्रकृति के प्रति जागरूक बनाती है।
  • विशेष अतिथि: अखंड आयुर्वेद संस्थान से डॉ. चंद्रशेखर तिवारी ने कहा कि भारतीय परंपरा में प्रकृति को ‘माता’ माना गया है और आयुर्वेद हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाना सिखाता है।

📜 महाकाव्यों से सीख और आधुनिक चुनौतियां

कार्यशाला में वक्ताओं ने प्राचीन ज्ञान को आधुनिक समस्याओं से जोड़कर प्रस्तुत किया:

  1. रामायण-महाभारत का दर्शन: वशिष्ठ योग संस्थान के प्रो. लालजीत पचोरी ने रामायण और महाभारत के उदाहरणों से समझाया कि ये ग्रंथ केवल धार्मिक नहीं, बल्कि नैतिक जीवन जीने के मार्गदर्शक हैं।
  2. भौतिकवाद बनाम प्रकृति: मुख्य वक्ता डॉ. नरेन्द्र सिंह (बीबीएयू, लखनऊ) ने कहा कि आज की असीमित उपभोग की प्रवृत्ति ने पर्यावरण को संकट में डाल दिया है। दर्शन शास्त्र हमें संयम और संतुलन सिखाकर इस संकट से बचा सकता है।

👥 सहभागिता और संचालन

भूमिकानाम
संचालनश्री अखिलेश विश्वकर्मा
आभार प्रदर्शनश्री निखिल मोदी
प्रतिभागीप्राध्यापक, शोधार्थी और योग विभाग के छात्र-छात्राएं

💡 कार्यशाला का निष्कर्ष

इस कार्यशाला ने विद्यार्थियों को यह संदेश दिया कि दर्शन के सिद्धांतों को दैनिक जीवन में अपनाकर ही हम आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित पर्यावरण छोड़ सकते हैं। कार्यक्रम के अंत में निखिल मोदी ने भविष्य में भी ऐसे जागरूकता कार्यक्रमों के आयोजन की प्रतिबद्धता दोहराई।

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