CBSE ‘थर्ड लैंग्वेज पॉलिसी’: अभिभावकों पर दोहरी मार! ₹700 की फ्रेंच बुक हुई रद्दी, इसी सत्र से संस्कृत पढ़ना अनिवार्य

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drnewsindia.com/ भोपाल

पहले से ही महंगी कॉपियों-किताबों के बोझ तले दबे सीबीएसई (CBSE) स्कूलों के अभिभावकों को एक और बड़ा झटका लगा है। नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने के बाद बोर्ड ने “थर्ड लैंग्वेज पॉलिसी” को इसी सत्र से अनिवार्य रूप से लागू कर दिया है।

इस नए नियम के कारण स्कूलों से ‘फ्रेंच’ भाषा को इस कदर बाहर कर दिया गया है कि पैरेंट्स द्वारा 400 से 700 रुपए में खरीदी गई महंगी किताबें अब रद्दी के भाव हो गई हैं। नए फॉर्मूले के तहत अंग्रेजी को “विदेशी भाषा” माना गया है, जिसके चलते अब छात्रों के लिए फ्रेंच की जगह “संस्कृत” पढ़ना अनिवार्य हो गया है।

अभिभावकों की लाचारी: बुक डिपो वालों ने इन महंगी फ्रेंच किताबों को वापस लेने से साफ मना कर दिया है, क्योंकि पब्लिशर्स को माल वापसी की डेडलाइन निकल चुकी है। नतीजा यह कि अब अभिभावकों को दोबारा जेब ढीली कर संस्कृत की महंगी किताबें खरीदनी पड़ रही हैं।

📅 बीच सत्र में नया सर्कुलर आने से बढ़ी मुश्किलें

निजी स्कूलों में 15 मार्च से 1 अप्रैल के बीच नया शैक्षणिक सत्र शुरू हो चुका था। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो, इसलिए पैरेंट्स ने शुरुआत में ही पूरा बुक-सेट खरीद लिया था। लेकिन सत्र शुरू होने के बाद सीबीएसई ने ये बदलाव किए:

  • 9 अप्रैल: कक्षा 6वीं (Class VI) के लिए त्रि-भाषा नीति का सर्कुलर जारी हुआ।
  • 15 मई: कक्षा 9वीं (Class IX) के लिए नया नियम लागू किया गया।

इस देरी से आए बदलाव के कारण पहले खरीदी जा चुकीं फ्रेंच की किताबें बेकार हो गईं। अब अभिभावकों को एनसीईआरटी (NCERT) की संस्कृत पुस्तक के साथ-साथ कई स्कूलों द्वारा सुझाई जा रही निजी प्रकाशकों (Private Publishers) की महंगी संस्कृत किताबें भी जबरन खरीदनी पड़ रही हैं।

🔄 समझिए गणित: क्यों फ्रेंच बाहर हुई और संस्कृत अनिवार्य?

सीबीएसई की नई त्रि-भाषा (Three-Language) नीति के नियम बेहद स्पष्ट हैं:

  1. छठी कक्षा से हर छात्र को तीन भाषाएं पढ़नी होंगी।
  2. इन तीन भाषाओं में से कम से कम दो भारतीय भाषाएं होना अनिवार्य है।
  3. इस पूरी व्यवस्था में अंग्रेजी को ‘विदेशी भाषा’ माना गया है।

सरल शब्दों में: यदि छात्र की पहली भाषा अंग्रेजी और दूसरी हिंदी है, तो तीसरी भाषा के रूप में किसी भारतीय भाषा (जैसे संस्कृत) का होना ही जरूरी होगा। इसी वजह से फ्रेंच को तत्काल प्रभाव से पाठ्यक्रम से बाहर कर दिया गया है।

🗣️ इस विवाद पर क्या है जिम्मेदार पक्षों का कहना?

“पब्लिशर्स या शॉप्स को किताबें वापस लेनी चाहिए”

“पब्लिशर्स 100 रुपये की लागत वाली किताबें 400-500 रुपये तक में बेचते हैं और हर साल अभिभावकों से हजारों रुपये वसूलते हैं। ऐसे में यदि बीच सत्र में नियम बदलने के कारण किसी किताब की जरूरत खत्म हो जाती है, तो पब्लिशर्स या बुक शॉप्स को वह किताब वापस लेकर अभिभावकों को राहत देनी चाहिए।” – प्रबोध पांड्या, महासचिव (पालक महासंघ)

“स्कूल सिर्फ नियमों का पालन कर रहे हैं”

“हम सिर्फ सीबीएसई के निर्देशों का पालन कर रहे हैं। सर्कुलर जारी होने के बाद सभी संबद्ध स्कूलों के लिए इन नियमों का पालन करना अनिवार्य है। स्कूलों के पास इसके अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है।” – दीपक राजपूत, संस्थापक (सोसाइटी फॉर प्राइवेट स्कूल डायरेक्टर्स, मप्र)

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