नई दिल्ली। नवरात्रि का नाम आते ही आंखों के सामने रंग-बिरंगे परिधानों में सजे लोग, गरबा की ताल पर थिरकते कदम और हाथों में डांडिया की खनक का दृश्य उभरने लगता है। खासकर महिलाओं का पारंपरिक चनिया चोली पहनकर गरबा करना नवरात्रि उत्सव की पहचान बन चुका है। चनिया का चौड़ा और लहराता हुआ घेर, उस पर की गई कढ़ाई, शीशे का काम, चमकीले रंग और पारंपरिक आभूषण गरबा की पूरी रौनक को और बढ़ा देते हैं।

वैदिक काल से जुड़ी मानी जाती हैं जड़ें
गुजरात के पारंपरिक पहनावे के इतिहास पर नजर डालें तो इसकी जड़ें प्राचीन भारतीय वस्त्र परंपरा तक जाती हैं। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, वैदिक काल में महिलाओं के पहनावे में अंतरीय और उत्तरीय जैसे वस्त्रों का उल्लेख मिलता है।
अंतरीय शरीर के निचले हिस्से को ढकने वाला वस्त्र था, जबकि उत्तरीय शरीर के ऊपरी हिस्से के लिए इस्तेमाल किया जाता था। उस समय वस्त्रों की शैली आज की सिलाई वाली पोशाकों से अलग थी। कपड़ों को शरीर के चारों ओर लपेटने और अलग-अलग तरीके से धारण करने की परंपरा प्रचलित थी।
समय के साथ भारतीय समाज और पहनावे में बदलाव आया। अलग-अलग क्षेत्रों में वस्त्रों के रूप, नाम और पहनने के तरीके भी बदलते गए। इसी क्रम में गुजरात और पश्चिमी भारत में पारंपरिक महिलाओं के परिधान का एक विशिष्ट रूप विकसित हुआ, जिसे आगे चलकर चनिया चोली की परंपरा से जोड़ा गया।
गुजरात और राजस्थान में अलग-अलग नामों की परंपरा
पारंपरिक भारतीय परिधानों की खासियत यह रही है कि एक जैसी मूल पोशाक अलग-अलग क्षेत्रों में अलग नाम और शैली के साथ विकसित हुई। गुजरात और राजस्थान भी इसका उदाहरण हैं।
राजस्थान में महिलाओं के पारंपरिक ऊपरी परिधान से जुड़े रूपों को कंचली जैसे नामों से जाना गया, जबकि गुजरात और सिंध क्षेत्र में कंजरी जैसे शब्द प्रचलित हुए। इसी तरह निचले हिस्से का घेरदार वस्त्र कहीं घाघरा तो कहीं चनिया के नाम से पहचाना गया।
क्षेत्रीय जलवायु, स्थानीय संस्कृति, कारीगरी और सामाजिक परंपराओं ने भी इन कपड़ों की बनावट और सजावट को प्रभावित किया। गुजरात की चनिया चोली में बाद के दौर में कढ़ाई, शीशे का काम, रंगीन धागों और अन्य पारंपरिक सजावटी तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ा।
चनिया चोली की कहानी केवल कपड़ों के बदलते रूप की कहानी नहीं है। यह भारत में परिधान परंपराओं के विकास और क्षेत्रीय संस्कृति की निरंतरता को भी दर्शाती है। वैदिक काल के अंतरीय और उत्तरीय से लेकर अलग-अलग दौर में विकसित हुए ऊपरी और निचले वस्त्रों तक, भारतीय महिलाओं के पहनावे ने लंबी यात्रा तय की है।
गुजरात में इस परंपरा ने लोकनृत्य, त्योहार और हस्तशिल्प के साथ मिलकर अपनी अलग पहचान बनाई। आज नवरात्रि में जब महिलाएं चनिया चोली पहनकर गरबा करती हैं, तो उनके पहनावे में केवल फैशन नहीं, बल्कि गुजरात की लोक संस्कृति, कारीगरी और लंबे समय से चली आ रही परिधान परंपरा की झलक भी दिखाई देती है।
यही कारण है कि नवरात्रि के गरबा मैदान में लहराता हुआ चनिया केवल एक खूबसूरत पोशाक नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत का जीवंत हिस्सा नजर आता है।




