सुप्रीम कोर्ट की दिल्ली पुलिस को सख्त चेतावनी, यौन अपराधियों के मन में कानून का डर पैदा करने पर जोर

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नई दिल्ली। दिल्ली-एनसीआर में हाल के दिनों में सामने आए दुष्कर्म और महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधों के मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 को दिल्ली पुलिस को बेहद सख्त संदेश दिया। मामले में स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई कर रही शीर्ष अदालत ने कहा कि केवल अपराध होने के बाद कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं है। पुलिस व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिससे अपराध करने की प्रवृत्ति रखने वाले लोगों के मन में कानून का वास्तविक डर पैदा हो और वे अपराध करने से पहले उसके परिणामों को लेकर भय महसूस करें।

अब कुछ किया तो मर जाएंगे’ वाला डर जरूरी

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से कहा कि यौन अपराध करने की प्रवृत्ति रखने वाले लोगों के मन में ऐसा डर पैदा होना चाहिए कि यदि वे अपराध करेंगे तो उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे। अदालत ने इसी संदर्भ में कहा कि पुलिस को अपराधियों के मन में यह भय पैदा करने की जरूरत है कि “अब कुछ किया तो मर जाएंगे।” यह टिप्पणी अपराधियों के खिलाफ किसी अतिरिक्त दंड की घोषणा नहीं थी, बल्कि अपराध की रोकथाम के लिए प्रभावी पुलिसिंग और कानून के डर की आवश्यकता पर अदालत की सख्त टिप्पणी थी।

शीर्ष अदालत का जोर इस बात पर रहा कि पुलिस की भूमिका केवल एफआईआर दर्ज करने, जांच करने और अपराध के बाद आरोपियों को पकड़ने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। यदि किसी इलाके में अपराध की आशंका अधिक है, तो वहां पहले से निगरानी, पुलिस की मौजूदगी और त्वरित प्रतिक्रिया की व्यवस्था मजबूत होनी चाहिए। अदालत ने इसी व्यापक दृष्टिकोण के तहत दिल्ली पुलिस की मौजूदा निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठाए।

CCTV से ज्यादा जरूरी उसकी लगातार निगरानी

सुनवाई के दौरान अदालत ने CCTV कैमरों की उपयोगिता पर भी सवाल उठाया। कोर्ट ने पुलिस से पूछा कि केवल CCTV कैमरे लगा देने से अपराध को किस हद तक रोका जा सकता है, यदि उनके फुटेज की लगातार निगरानी करने वाली प्रभावी व्यवस्था मौजूद न हो। अदालत के मुताबिक कैमरा किसी व्यक्ति को पार्क या किसी अन्य स्थान में प्रवेश करते हुए रिकॉर्ड कर सकता है, लेकिन यदि घटना के समय कोई तत्काल हस्तक्षेप नहीं हुआ तो अपराध पहले ही हो सकता है।

इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने निरंतर निगरानी की व्यवस्था और संभावित ‘वॉर रूम’ जैसे तंत्र की जरूरत पर सवाल उठाया। ऐसे केंद्रों का उद्देश्य विभिन्न इलाकों से आने वाली निगरानी संबंधी सूचनाओं पर लगातार नजर रखना और जरूरत पड़ने पर पुलिस प्रतिक्रिया को तेज करना हो सकता है। अदालत ने पुलिस से यह बताने को कहा कि अपराध को घटना के बाद रिकॉर्ड करने के बजाय उसे होने से पहले रोकने के लिए उसकी क्या ठोस रणनीति है।

शीर्ष अदालत की सुनवाई से यह संदेश साफ है कि महिला सुरक्षा को केवल अपराध के आंकड़ों या अपराध होने के बाद की जांच के आधार पर नहीं देखा जा सकता। पुलिस की प्राथमिक जिम्मेदारी अपराध की रोकथाम और ऐसा वातावरण तैयार करना है जिसमें संभावित अपराधी कानून की कार्रवाई से भयभीत रहें।

दिल्ली-एनसीआर में हाल की घटनाओं पर स्वतः संज्ञान लेकर सुप्रीम कोर्ट ने इसी व्यापक सवाल को केंद्र में रखा है कि महिलाओं और बच्चों के लिए सार्वजनिक स्थानों को वास्तव में सुरक्षित कैसे बनाया जाए। अदालत ने दिल्ली पुलिस से ठोस सुरक्षा उपायों और प्रभावी निगरानी व्यवस्था पर काम करने की अपेक्षा जताई है। आने वाले समय में इस मामले की सुनवाई के दौरान पुलिस और संबंधित अधिकारियों की ओर से उठाए गए कदमों तथा उनके वास्तविक प्रभाव पर भी अदालत की नजर रहेगी।

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