आज की व्यस्त जीवनशैली में घंटों तक कुर्सी पर बैठकर काम करना आम बात हो गई है। ऑफिस में कंप्यूटर के सामने काम करने वाले कर्मचारी हों, घर से काम करने वाले लोग हों या लंबे समय तक पढ़ाई करने वाले विद्यार्थी, कई लोगों का दिन अधिकतर बैठकर ही गुजरता है। शुरुआत में यह आदत सामान्य लग सकती है, लेकिन लंबे समय तक शरीर को एक ही स्थिति में रखने से गर्दन, कंधों, पीठ और कूल्हों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। समय के साथ कुछ लोगों को अकड़न, मांसपेशियों में खिंचाव और जोड़ों के आसपास असहजता महसूस होने लगती है।
क्या है ‘क्रीप’ की प्रक्रिया?
क्रीप (Creep) बायोमैकेनिक्स में इस्तेमाल होने वाला एक शब्द है। इसका संबंध इस बात से है कि किसी ऊतक पर लगातार दबाव या खिंचाव पड़ने पर समय के साथ उसके आकार या विकृति में बदलाव आ सकता है। शरीर के अलग-अलग ऊतकों की प्रतिक्रिया अलग होती है। मांसपेशियां, लिगामेंट, टेंडन और अन्य संयोजी ऊतक एक जैसी विशेषताएं नहीं रखते।
उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति की गर्दन लंबे समय तक एक ही दिशा में झुकी रहती है या वह लगातार आगे की ओर झुककर स्क्रीन देखता है, तो गर्दन और कंधों की मांसपेशियों पर पड़ने वाला भार बदल सकता है। इसी तरह, लंबे समय तक बैठने पर कूल्हों और पीठ के आसपास के ऊतकों को लगातार एक खास स्थिति में रहना पड़ता है।
हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि शरीर एक बार किसी मुद्रा में ढल जाए तो उससे बाहर निकलना हमेशा मुश्किल हो जाता है। शरीर में अनुकूलन की क्षमता होती है। नियमित गतिविधि, उचित व्यायाम और कार्य करने की मुद्रा में बदलाव से कई प्रकार की अकड़न और असहजता को कम करने में मदद मिल सकती है।





