बर्लिन: जर्मनी की राजधानी बर्लिन में आयोजित बर्लिन ग्लोबल डायलॉग 2026 के दौरान केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने जलवायु परिवर्तन और वैश्विक कार्बन उत्सर्जन की जिम्मेदारी को लेकर विकसित देशों के दृष्टिकोण पर सवाल उठाए। शुक्रवार को एक सत्र में उन्होंने कहा कि जलवायु संकट के लिए भारत जैसे विकासशील देशों को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है। उनके अनुसार, इस मुद्दे पर चर्चा करते समय विकसित देशों की ऐतिहासिक भूमिका और अलग-अलग देशों के उत्सर्जन में योगदान को भी ध्यान में रखना चाहिए।
पैनल चर्चा में गोयल ने किया विरोध
बर्लिन ग्लोबल डायलॉग के एक सत्र के दौरान पैनल में शामिल एक अन्य व्यक्ति ने जलवायु संकट के लिए सभी लोगों को जिम्मेदार बताया। इस टिप्पणी पर पीयूष गोयल ने विरोध जताया और भारत के संदर्भ में आंकड़े प्रस्तुत किए।
गोयल ने बताया कि भारत में दुनिया की लगभग 17 प्रतिशत आबादी रहती है, लेकिन वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में देश की हिस्सेदारी 3 प्रतिशत से भी कम है। इन आंकड़ों के माध्यम से उन्होंने इस धारणा पर सवाल उठाया कि जलवायु परिवर्तन की समस्या के लिए सभी देशों की जिम्मेदारी एक समान मानी जानी चाहिए।
विकसित देशों की ऐतिहासिक भूमिका पर सवाल
जलवायु परिवर्तन को लेकर भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ऐतिहासिक जिम्मेदारी का मुद्दा उठाता रहा है। औद्योगिक क्रांति के बाद विकसित अर्थव्यवस्थाओं ने बड़े पैमाने पर औद्योगीकरण, परिवहन, बिजली उत्पादन और जीवाश्म ईंधनों के इस्तेमाल के जरिए आर्थिक प्रगति हासिल की। इसी प्रक्रिया के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी बढ़ा।
वैश्विक जलवायु बहस में ऐतिहासिक उत्सर्जन का प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि कार्बन डाइऑक्साइड लंबे समय तक वातावरण में बनी रह सकती है। इसका अर्थ है कि आज के जलवायु संकट में केवल मौजूदा उत्सर्जन ही नहीं, बल्कि अतीत में वातावरण में जमा हुई ग्रीनहाउस गैसों का भी योगदान है।
भारत सहित कई विकासशील देश यह तर्क देते रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की जिम्मेदारी तय करते समय विकसित देशों की ऐतिहासिक भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। इन देशों के अनुसार, जिन अर्थव्यवस्थाओं ने पहले ही औद्योगिक विकास का लाभ प्राप्त कर लिया है, उन्हें उत्सर्जन में कटौती और विकासशील देशों को जलवायु वित्त उपलब्ध कराने में अधिक योगदान देना चाहिए।


भारत की आबादी और उत्सर्जन का सवाल
पीयूष गोयल ने भारत की लगभग 17 प्रतिशत वैश्विक आबादी और कार्बन उत्सर्जन में 3 प्रतिशत से कम हिस्सेदारी का उल्लेख करके जनसंख्या और उत्सर्जन के बीच के अंतर को रेखांकित किया।
भारत दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देशों में शामिल है। इतनी बड़ी आबादी के लिए बिजली, परिवहन, आवास, उद्योग, कृषि और अन्य बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है। देश की आर्थिक गतिविधियां बढ़ने के साथ ऊर्जा की मांग भी बढ़ती है।
ऐसी परिस्थितियों में भारत के सामने विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की जरूरत है। देश को जहां एक ओर लोगों के जीवन स्तर में सुधार करना है, वहीं दूसरी ओर उत्सर्जन कम करने और स्वच्छ ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की दिशा में भी काम करना है।
बर्लिन ग्लोबल डायलॉग 2026 में पीयूष गोयल का बयान जलवायु परिवर्तन की जिम्मेदारी और वैश्विक उत्सर्जन के बंटवारे को लेकर भारत के दृष्टिकोण को सामने लाता है। उन्होंने भारत की जनसंख्या और वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में उसकी हिस्सेदारी के आंकड़े रखते हुए विकासशील देशों को जलवायु संकट के लिए समान रूप से जिम्मेदार ठहराने पर आपत्ति जताई।
इस बहस का व्यापक संदेश यह है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए वैश्विक प्रयास जरूरी हैं, लेकिन जिम्मेदारी तय करते समय ऐतिहासिक उत्सर्जन, वर्तमान योगदान, आर्थिक क्षमता और विकास की जरूरतों पर भी विचार किया जाना चाहिए। आने वाले समय में जलवायु नीति की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि देश उत्सर्जन में कटौती के साथ-साथ विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की जरूरतों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बीच किस तरह संतुलन बनाते हैं।




