मध्य प्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व में बाघों की सुरक्षा के लिए किए जा रहे प्रयासों के बावजूद कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) का खतरा बना हुआ है। रिजर्व में इस वर्ष अब तक 11 बाघों की मौत होने की जानकारी सामने आई है। इनमें अप्रैल से अक्टूबर के बीच छह महीने की अवधि में नौ बाघों की मौत वायरस के संक्रमण से होने की बात कही गई है। संक्रमण की रोकथाम के लिए बफर क्षेत्र से लगे गांवों में हजारों आवारा कुत्तों का टीकाकरण कराने और उन्हें बूस्टर डोज देने के बावजूद बाघों की मौत ने वन प्रबंधन की चिंता बढ़ा दी है।
कान्हा में बाघों की मौत से बढ़ी चिंता
कान्हा टाइगर रिजर्व देश के महत्वपूर्ण बाघ संरक्षण क्षेत्रों में शामिल है। यहां बाघों की सुरक्षा के लिए निगरानी, वन्यजीवों के स्वास्थ्य पर नजर और उनके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखने जैसे प्रयास किए जाते हैं। इसके बावजूद संक्रामक बीमारी के कारण बाघों की मौत होना संरक्षण व्यवस्था के सामने चुनौती पेश करता है।
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इस वर्ष अब तक रिजर्व में 11 बाघों की मौत हुई है। इनमें से अप्रैल से अक्टूबर के बीच नौ मौतें CDV संक्रमण से जुड़ी बताई गई हैं। यह आंकड़ा संक्रमण की रोकथाम और वन्यजीवों के स्वास्थ्य की निगरानी के महत्व को रेखांकित करता है।
हालांकि, सभी 11 मौतों को एक ही बीमारी से जोड़ना उचित नहीं होगा, क्योंकि उपलब्ध विवरण में केवल नौ मौतों को वायरस के संक्रमण से संबंधित बताया गया है। बाकी दो मौतों के कारणों की जानकारी यहां उपलब्ध नहीं है।
क्या है कैनाइन डिस्टेंपर वायरस?
कैनाइन डिस्टेंपर वायरस एक संक्रामक वायरस है, जो मुख्य रूप से कुत्तों और कई अन्य मांसाहारी स्तनधारियों को प्रभावित कर सकता है। यह बीमारी वन्यजीवों के लिए भी गंभीर साबित हो सकती है। अलग-अलग प्रजातियों में इसके प्रभाव की गंभीरता अलग हो सकती है।
संक्रमित पशुओं के शारीरिक स्राव और निकट संपर्क के माध्यम से वायरस फैल सकता है। बीमारी से प्रभावित जानवरों में बुखार, सुस्ती, सांस से संबंधित समस्याएं, पाचन तंत्र में परेशानी और कुछ मामलों में तंत्रिका तंत्र से जुड़े लक्षण दिखाई दे सकते हैं। हालांकि, केवल लक्षणों के आधार पर संक्रमण की पुष्टि नहीं की जा सकती। इसके लिए पशु चिकित्सकीय परीक्षण और प्रयोगशाला जांच की आवश्यकता होती है।
तीन हजार आवारा कुत्तों का टीकाकरण
कान्हा टाइगर रिजर्व में CDV संक्रमण को रोकने के लिए 21 अप्रैल को सरही क्षेत्र में एक बाघ शावक की मौत के बाद अभियान शुरू किया गया था। इसके अंतर्गत रिजर्व के बफर क्षेत्र से लगे 167 गांवों में करीब तीन हजार आवारा कुत्तों का टीकाकरण कराया गया।
अभियान के तहत केवल पहली खुराक तक ही सीमित नहीं रहा गया, बल्कि लगभग एक महीने बाद इन कुत्तों को बूस्टर डोज भी दिए गए। इस कदम का उद्देश्य संक्रमण के संभावित प्रसार को नियंत्रित करना और जंगल के आसपास मौजूद पशुओं के स्वास्थ्य जोखिम को कम करना था।
बफर क्षेत्र में आवारा कुत्तों का टीकाकरण वन्यजीव संरक्षण से जुड़ी एक महत्वपूर्ण रणनीति हो सकती है, क्योंकि जंगल और गांवों के बीच मौजूद संपर्क क्षेत्र में घरेलू तथा जंगली पशुओं की आवाजाही होती रहती है। ऐसे क्षेत्रों में बीमारी की निगरानी और पशुओं के टीकाकरण के जरिए संक्रमण के संभावित प्रसार को कम करने का प्रयास किया जाता है।
बफर क्षेत्र और दूसरे जंगलों से आए वन्यजीवों की भूमिका
कान्हा प्रबंधन ने 6 अक्टूबर को मृत मिली बाघिन और 18 अक्टूबर को मृत मिले शावक को दूसरे जंगलों से आया हुआ बताया है। शावक को बफर क्षेत्र से लगे वन विकास निगम के जंगल में स्थित अरौली गांव से पकड़ा गया था।
वन्यजीवों का एक जंगल से दूसरे जंगल या आसपास के वन क्षेत्रों में आना-जाना उनके प्राकृतिक व्यवहार का हिस्सा हो सकता है। ऐसे में किसी एक संरक्षित क्षेत्र में संक्रमण को रोकने के लिए केवल रिजर्व की सीमा के भीतर निगरानी करना पर्याप्त नहीं हो सकता। आसपास के वन क्षेत्रों और गांवों में भी पशुओं की स्वास्थ्य स्थिति पर ध्यान देना जरूरी हो सकता है।
हालांकि, उपलब्ध जानकारी से यह साबित नहीं होता कि अक्टूबर में मृत मिले वन्यजीवों में वायरस किसी दूसरे जंगल से आया था। उनके दूसरे क्षेत्र से आने की जानकारी और संक्रमण के वास्तविक स्रोत के बीच संबंध स्थापित करने के लिए वैज्ञानिक जांच आवश्यक है।
फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर संक्रमण के वास्तविक स्रोत, अक्टूबर में मृत मिले दोनों वन्यजीवों की विस्तृत स्वास्थ्य स्थिति और टीकाकरण अभियान के समग्र प्रभाव के बारे में अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इन पहलुओं को स्पष्ट करने के लिए वैज्ञानिक जांच, पशु चिकित्सा संबंधी आकलन और वन क्षेत्रों में निगरानी की जानकारी महत्वपूर्ण होगी।
कान्हा में बाघों की सुरक्षा के लिए आगे की रणनीति तय करते समय वन्यजीवों के स्वास्थ्य के साथ-साथ बफर क्षेत्र में रहने वाले पशुओं की स्थिति पर भी ध्यान देना होगा। संक्रमण की समय पर पहचान और रोकथाम के प्रभावी उपाय ही इस चुनौती से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।






