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भोपाल | मध्यप्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में करोड़ों खर्च करने के बाद भी मरीजों को आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। भोपाल के हमीदिया अस्पताल सहित प्रदेश के 5 मेडिकल कॉलेजों में 24 करोड़ रुपये की लागत से अत्याधुनिक सीटी स्कैन और एमआरआई मशीनें तो लगा दी गईं, लेकिन महज 30 लाख रुपये के ‘प्रेशर इंजेक्टर’ न होने से ये मशीनें ‘शो-पीस’ बनकर रह गई हैं।
क्यों जरूरी है प्रेशर इंजेक्टर?
विशेषज्ञों के अनुसार, बिना प्रेशर इंजेक्टर के कॉन्ट्रास्ट स्टडी (Contrast Study) संभव नहीं है। यह उपकरण शरीर में सटीक दबाव के साथ डाई (Contrast Dye) भेजता है, जिससे गंभीर बीमारियों की पहचान होती है।
इसके बिना इन जांचों में आ रही हैं मुश्किलें
- कैंसर और ट्यूमर: ट्यूमर की आक्रामकता और उसकी सही स्थिति का पता नहीं चल पा रहा।
- हृदय रोग: हार्ट अटैक के बाद मांसपेशियों में हुए डैमेज और धमनियों के ब्लॉकेज की सटीक रिपोर्ट नहीं मिल रही।
- न्यूरोलॉजी: ब्रेन ट्यूमर और मल्टीपल स्केलेरोसिस जैसी जटिल बीमारियों की जांच अधूरी रह रही है।
करोड़ों का सेटअप, लेकिन ‘मैनुअल’ जुगाड़
हैरानी की बात यह है कि वर्ल्ड क्लास मशीनों में अब ‘मैनुअल डाई’ का इस्तेमाल किया जा रहा है। डॉक्टर हाथ से सीरिंज के जरिए नस में डाई डालते हैं, जिससे कई जोखिम पैदा हो रहे हैं:
- खराब रिपोर्ट: हाथ से डाई देने पर दबाव एक समान नहीं रहता, जिससे इमेज धुंधली आती है।
- महंगी डाई की बर्बादी: इंजेक्टर की कमी के कारण महंगी डाई ट्यूब में ही रह जाती है।
- मरीजों पर आर्थिक बोझ: सटीक रिपोर्ट न मिलने के कारण मरीजों को मजबूरी में निजी सेंटरों पर हजारों रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं।
प्रशासनिक लापरवाही या तकनीकी चूक?
दावा किया जा रहा है कि शुरुआत में यह इंजेक्टर टेंडर का हिस्सा था, लेकिन मध्यप्रदेश हेल्थ कॉर्पोरेशन ने फाइनल टेंडर से इसे बाहर कर दिया। 18 करोड़ की एक एमआरआई मशीन खरीदने वाली सरकार महज 30 लाख का उपकरण क्यों नहीं जुटा पाई, यह बड़ा सवाल है।
प्रबंधन का तर्क: गांधी मेडिकल कॉलेज की डीन डॉ. कविता एन सिंह का कहना है कि “मरीजों की जांच समय पर हो रही है और उन्हें परेशानी नहीं हो रही,” लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।
एक नजर में हकीकत
| मद | विवरण |
| कुल सेटअप लागत | ₹24 करोड़ (5 मेडिकल कॉलेज) |
| अधूरी जांचें | कैंसर, हार्ट, ब्रेन ट्यूमर, न्यूरोलॉजी |
| मशीन की क्षमता | विश्वस्तरीय, एडवांस तकनीक |
| वर्तमान स्थिति | बिना प्रेशर इंजेक्टर के ‘मैनुअल’ संचालन |
| कमी | ₹30 लाख का एक प्रेशर इंजेक्टर |




