चंद्रयान की बढ़ेगी उम्र: अब चंद्रमा की कड़ाके की ठंड में भी 200 दिनों तक काम करेगा इसरो का लैंडर!

0
2

drnewsindai.com

बेंगलुरु: भारत का अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) अब चांद पर इतिहास रचने के बाद एक और बड़ी छलांग लगाने की तैयारी में है। चंद्रमा की हाड़ कंपा देने वाली रातों (जहां तापमान -130°C से भी नीचे चला जाता है) से अपने लैंडर को बचाने के लिए इसरो अब परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) के साथ मिलकर एक उन्नत कृत्रिम तापन प्रणाली (Advanced Artificial Heating System) विकसित कर रहा है।

इसरो के शीर्ष वैज्ञानिक और एलपीएससी (LPSC) के निदेशक वी. नारायणन ने बेंगलुरु में आयोजित सीएसआईआर (CSIR) और स्टार्टअप उद्यमिता सम्मेलन में इस बात की आधिकारिक घोषणा की।

💡 चंद्रयान-3 की सीमा और नया लक्ष्य

  • चंद्रयान-3 की सीमा: सौर ऊर्जा (Solar Power) से संचालित चंद्रयान-3 का विक्रम लैंडर चंद्रमा पर केवल 14 पृथ्वी दिनों (यानी 1 चंद्र दिवस) तक ही सक्रिय रह सका था। इसका कारण यह था कि चांद पर रात होते ही सूरज की रोशनी बंद हो गई और भयंकर ठंड के कारण उपकरण जाम हो गए।
  • नया लक्ष्य: परमाणु ऊर्जा विभाग के सहयोग से इसरो अब ऐसा लैंडर तैयार कर रहा है जो चंद्रमा की खतरनाक रातों को भी झेल सके और 200 दिनों से अधिक समय तक सक्रिय रहकर डेटा भेज सके।

🥶 चंद्रमा का जानलेवा मौसम: क्यों जरूरी है परमाणु हीटर?

चंद्रमा पर जीवन और मशीनों दोनों के लिए स्थितियां बेहद प्रतिकूल हैं। वहां दिन और रात की अवधि हमारे यहां की तरह 24 घंटे की नहीं, बल्कि लगभग 14-14 पृथ्वी दिनों के बराबर होती है।

समयतापमान (Celsius में)
चांद पर दिन+121°C तक (अत्यधिक गर्म)
चांद पर रात-130°C से भी नीचे (भयंकर बर्फीली ठंड)

इस नए लैंडर में विशेष कृत्रिम हीटर (Nuclear-powered Heaters) लगे होंगे, जो बिना सूरज की रोशनी के भी लैंडर के संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को गर्म रखेंगे और उन्हें नष्ट होने से बचाएंगे।

🤝 ISRO और CSIR की महा-साझेदारी

श्री नारायणन ने बताया कि अंतरिक्ष क्षेत्र को आत्मनिर्भर बनाने के लिए इसरो और सीएसआईआर ने तकनीकी सहयोग के लिए 40 महत्वपूर्ण क्षेत्रों की पहचान की है:

  • प्रथम चरण: इनमें से 17 परियोजनाओं को पहले चरण में लागू करने की मंजूरी मिल चुकी है।
  • अगला कदम: ऐसा ही एक रिसर्च एग्रीमेंट विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के साथ भी किया जा रहा है।

🧑‍🚀 गगनयान और अंतरिक्ष दवाओं पर काम

यह साझेदारी सिर्फ चांद तक सीमित नहीं है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के साथ मिलकर इसरो भारत के पहले मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन ‘गगनयान’ (Gaganyaan) के लिए विशेष अंतरिक्ष औषधियां (Space Medicines) तैयार करने पर काम कर रहा है।

इसके अलावा, हाल ही में एक्सिओम-4 (Axiom-4) मिशन के दौरान भारतीय अंतरिक्ष यात्री ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला द्वारा अंतरिक्ष में किए गए सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण (Micro-gravity) प्रयोगों के लिए इसरो ने जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) के साथ मिलकर भी काम किया था।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here