बारिश में सड़ रही 50 ट्रक धान, जिम्मेदार कौन? विधायक ने किया ओपन कैंप का निरीक्षण

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सालों से खुले में पड़ी सरकारी धान पर उठे सवाल, बारिश में खराब हो रही उपज देखकर विधायक बोले- गरीबों को दे देते तो बेहतर होता; अधिकारी बोले- 5 से 6 साल पुरानी है धान, निपटारे के लिए शासन को भेजा प्रस्ताव

डिंडौरी। जिले में सरकारी धान के भंडारण और उसके समय पर उठाव को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। अमरपुर जनपद पंचायत क्षेत्र के सिधौली गांव में संचालित धान के ओपन कैंप में करीब 50 ट्रक धान बारिश में खराब होती मिली। शहपुरा विधायक ओमप्रकाश धुर्वे और जिला पंचायत अध्यक्ष रुदेश परस्ते ने मौके पर पहुंचकर स्थिति का निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान बड़ी मात्रा में धान खुले में पड़ी दिखाई दी, जबकि कुछ धान पॉलीथिन से ढकी हुई थी।

बारिश के बीच खुले में पड़ी सरकारी धान

विधायक ओमप्रकाश धुर्वे के अनुसार, वे शुक्रवार को जन विश्वास अभियान में शामिल होने के लिए अमरपुर क्षेत्र से गुजर रहे थे। रास्ते में ओपन कैंप देखकर वे वहां रुके और धान की स्थिति का जायजा लिया। निरीक्षण के दौरान बड़ी मात्रा में धान बारिश से प्रभावित मिली।

विधायक ने सवाल उठाया कि किसानों से खरीदी गई धान को सुरक्षित रखने और समय पर मिलिंग के लिए भेजने की व्यवस्था क्यों नहीं की गई। यदि धान लंबे समय से खुले में पड़ी है तो उसके रखरखाव, गुणवत्ता और सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है, यह भी जांच का विषय है।

सालों पुरानी धान कैंप में क्यों पड़ी रही?

मामले को और गंभीर इसलिए माना जा रहा है क्योंकि डिप्टी कलेक्टर एवं प्रभारी अधिकारी वैद्यनाथ वासनिक ने कैंप में रखी धान को करीब 5 से 6 साल पुरानी बताया है। अधिकारी के अनुसार, इस धान की खरीदी उस समय गोगरिन कंपनी ने की थी।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि धान इतनी पुरानी है तो इतने वर्षों तक उसका उठाव, मिलिंग या निपटारा क्यों नहीं किया गया? क्या समय-समय पर स्टॉक का भौतिक सत्यापन हुआ? यदि हुआ तो खराब होती धान पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई? इन सवालों के जवाब सामने आना बाकी हैं।

‘गरीबों को दे देते तो बेहतर होता’

निरीक्षण के दौरान विधायक ओमप्रकाश धुर्वे ने कहा कि यदि यह धान किसी गरीब को दे दी जाती तो बेहतर होता। उन्होंने कहा कि इस तरह खुले में रखी धान के खराब होने से शासन के लाखों रुपए का नुकसान हो सकता है।

विधायक ने अधिकारियों से पूरे मामले को लेकर चर्चा करने की बात कही है। उन्होंने यह भी बताया कि कैंप में तीन चौकीदार तैनात हैं। हालांकि चौकीदारों की मौजूदगी के बावजूद धान को बारिश से बचाने के लिए पर्याप्त इंतजाम क्यों नहीं किए गए, यह भी सवालों के घेरे में है।

नीलामी होगी या गड्ढे में दबाई जाएगी धान

डिप्टी कलेक्टर वैद्यनाथ वासनिक ने बताया कि धान के निपटारे के लिए शासन को डीसीसी (डिस्पोजल ऑफ कॉन्डेम्ड कमोडिटी) का प्रस्ताव भेजा गया है। शासन से निर्देश मिलने के बाद धान की नीलामी कराई जाएगी या नियमानुसार उसे गड्ढे में दबाया जाएगा।

लेकिन इससे पहले यह स्पष्ट होना जरूरी है कि इतनी बड़ी मात्रा में धान वर्षों तक कैंप में क्यों पड़ी रही और उसके संरक्षण की जिम्मेदारी किस स्तर पर थी। यदि धान उपयोग योग्य नहीं रही तो उसके खराब होने से पहले उसका निपटारा क्यों नहीं किया गया।

सरकारी संपत्ति की बर्बादी पर उठे सवाल

किसानों से खरीदी गई उपज के बदले सरकार ने करोड़ों रुपए खर्च किए होंगे। ऐसे में यदि धान लंबे समय तक खुले में पड़े रहने और बारिश के कारण खराब होती है, तो इसका सीधा असर सरकारी संसाधनों पर पड़ता है। मामले में केवल धान के निपटारे से आगे बढ़कर यह भी जांच जरूरी है कि खरीद से लेकर भंडारण, परिवहन, मिलिंग और रखरखाव की पूरी प्रक्रिया में कहां लापरवाही हुई।

अब देखना होगा कि प्रशासन इस मामले में केवल खराब धान के निपटारे तक सीमित रहता है या फिर वर्षों से पड़ी इस धान की पूरी प्रक्रिया की जांच कर जिम्मेदारी भी तय करता है।

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