मंथरा के कुसंग ने बदला अयोध्या का भाग्य: कंचन विहार में श्रीराम कथा के दौरान भावुक हुए श्रद्धालु

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सीहोर। शहर के कंचन विहार (विश्वनाथपुरी) स्थित श्री संकट मोचन हनुमान मंदिर समिति के तत्वाधान में आयोजित नौ दिवसीय श्रीराम कथा में भक्ति का प्रवाह निरंतर जारी है। कथा के सातवें दिन महंत उद्धवदास महाराज ने श्रीराम वनवास और मंथरा-कैकेयी प्रसंग का मार्मिक वर्णन किया।

महंत जी ने बताया कि आगामी 17 अप्रैल को इस भव्य श्रीराम कथा का विश्राम (समापन) किया जाएगा।

कुसंगति का परिणाम: जब मंथरा ने भरे कान

कथा के दौरान महाराज श्री ने कुसंगति के प्रभाव पर जोर देते हुए कहा कि व्यक्ति को सत्संग करना चाहिए, लेकिन कुसंग से हमेशा बचना चाहिए। उन्होंने बताया कि राजा दशरथ द्वारा श्रीराम के राजतिलक की घोषणा करते ही पूरी अयोध्या में हर्ष का माहौल था, लेकिन दासी मंथरा के बहकावे में आकर रानी कैकेयी ने राजा दशरथ से अपने दो वरदान मांग लिए— भरत को राज्य और राम को 14 वर्ष का वनवास।

“हमारे आस-पास के लोग ही हमारे भविष्य का निर्माण करते हैं। इसलिए जहां भलाई और भगवान की चर्चा हो, वहां सौ काम छोड़कर शामिल होना चाहिए।”महंत उद्धवदास महाराज


कथा के प्रमुख प्रसंग और जीवन मंत्र:

  • पुत्र धर्म और राम का त्याग: श्रीराम ने अपने पिता के वचनों की लाज रखने के लिए सहर्ष वन जाना स्वीकार किया। उन्होंने वनवास में भी चार लाभ बताए— भाई भरत को राज्य मिलना, माता कैकेयी की इच्छा पूर्ति, पिता के धर्म की रक्षा और वन में संतों का सानिध्य।
  • लक्ष्मण का अनन्य प्रेम: वनवास के समय जब श्रीराम ने लक्ष्मण को माता-पिता की सेवा के लिए अयोध्या रुकने का उपदेश दिया, तो लक्ष्मण जी ने भावुक होकर कहा कि “मेरे लिए तो आपके चरण कमल ही स्वर्ग हैं।”
  • शिक्षा का महत्व: बचपन में माँ द्वारा दी गई शिक्षा जीवनभर साथ देती है और जवानी में महात्माओं की शिक्षा जीवन को सुखी बनाती है।
  • मित्रता की परिभाषा: महाराज श्री ने बताया कि मित्र दर्पण जैसा होना चाहिए, जो हमारी अच्छाई के साथ-साथ हमारी कमियों (बुराई) को भी स्पष्ट रूप से बताए।

आज की कथा का सार (Highlights):

  1. मंथरा-कैकेयी-दशर्थ प्रसंग: कैसे एक गलत सलाह ने खुशियों को वियोग में बदल दिया।
  2. आज्ञा पालन: माता-पिता की आज्ञा मानना ही पुत्र का प्रथम धर्म है।
  3. सकारात्मक दृष्टिकोण: श्रीराम की चारित्रिक विशेषता है कि वे बुराई में भी अच्छाई ढूंढ लेते हैं।
  4. सत्संग की महिमा: कुसंग का त्याग ही सत्संग का असली फल है।

मंदिर समिति ने सभी धर्मप्रेमी जनता से अपील की है कि 17 अप्रैल को कथा के विश्राम दिवस पर अधिक से अधिक संख्या में पधारकर पुण्य लाभ अर्जित करें।


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