महा-विस्तार या इंदौर की अनदेखी? उज्जैन-इंदौर मेट्रोपॉलिटन एरिया के 16,000 वर्ग किमी दायरे पर उठे गंभीर सवाल, विशेषज्ञ हैरान

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इंदौर/उज्जैन (विशेष रिपोर्ट)। मध्य प्रदेश में प्रस्तावित ‘उज्जैन-इंदौर मेट्रोपॉलिटन एरिया’ (महानगर क्षेत्र) के नए और विस्तारित प्रस्ताव को लेकर चौतरफा विवाद खड़ा हो गया है। एक साथ छह जिलों को शामिल किए जाने, क्षेत्रफल को बढ़ाकर 16 हजार वर्ग किलोमीटर करने और नाम में आर्थिक राजधानी इंदौर की बजाय उज्जैन को प्राथमिकता देने पर मास्टर प्लान के विशेषज्ञों और इंदौरवासियों ने कड़ी आपत्ति जताई है। लोगों का मानना है कि इस नए स्वरूप से इंदौर को हाशिए पर धकेलने की कोशिश की जा रही है।

📉 5 बार बदला प्रस्ताव: 6,500 से सीधे 16,000 वर्ग किमी हुआ दायरा

मेट्रोपॉलिटन एरिया के गठन की प्रक्रिया शुरुआत से ही बदलावों के दौर से गुजरती रही है, जिससे इसकी पूरी रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं:

  • शुरुआती खाका: जब पहला प्रस्ताव तैयार हुआ था, तब इसमें केवल 4 जिले— इंदौर, उज्जैन, धार और देवास शामिल थे, जिनका कुल दायरा 6,613 वर्ग किलोमीटर तय किया गया था।
  • राजनीतिक और प्रशासनिक जोड़-तोड़: पहले इसमें बदनावर और बड़नगर को जोड़ा गया। इसके बाद संशोधित प्रस्ताव में शाजापुर, मक्सी और यहाँ तक कि 140 किलोमीटर दूर स्थित रतलाम को भी शामिल कर लिया गया।
  • अंतिम मंजूरी: इन बदलावों के बाद इस महानगर क्षेत्र का कुल क्षेत्रफल बढ़कर 16,000.87 वर्ग किलोमीटर हो गया है, जिसे सरकार ने अंतिम मंजूरी दे दी है।

❓ क्यों उठ रहे हैं सवाल? विशेषज्ञों और जनता की 3 बड़ी आपत्तियां

1. रतलाम से 140 किमी का सफर, जनता परेशान!

इंदौर से रतलाम की दूरी करीब 140 किलोमीटर है। यदि मेट्रोपॉलिटन अथॉरिटी का मुख्य कार्यालय एक जगह बनता है, तो रतलाम के नागरिकों को अपने छोटे-छोटे कामों या प्रशासनिक बैठकों के लिए घंटों का सफर तय करना पड़ेगा, जो व्यवहारिक नहीं है।

2. विकास की कछुआ गति और बेतरतीब बसाहट

विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी क्षेत्र का विकास अपने समय और गति से होता है। इंदौर तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन पिछले 20 सालों में यहाँ मुख्य विकास केवल बायपास की तरफ हुआ है। भव्य माना जाने वाला ‘सुपर कॉरिडोर’ आज भी अपेक्षित बसाहट के लिए तरस रहा है। ऐसे में 16 हजार वर्ग किमी के सुदूर ग्रामीण इलाकों को मेट्रोपॉलिटन स्तर पर विकसित होने में दशकों लग जाएंगे।

3. इंदौर को पीछे धकेलने की कसक

शहर के लोग खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। नाम में इंदौर को पीछे रखने के बाद अब चर्चा है कि इसका मुख्य कार्यालय भी उज्जैन में बनाया जा सकता है। इस पर इंदौर के सांसद शंकर लालवानी ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर मांग की है कि इंदौर प्रदेश की आर्थिक राजधानी है, इसलिए महानगर प्राधिकरण का मुख्य कार्यालय इंदौर में ही स्थापित होना चाहिए।

📊 मेट्रोपॉलिटन एरिया: आंकड़ों की ‘फैक्ट फाइल’

इस महा-परियोजना के कानूनी नोटिफिकेशन के अनुसार जमीनी हकीकत इस प्रकार है:

  • आबादी का गणित: इस पूरे मेट्रोपॉलिटन एरिया के दायरे में 6 जिलों की कुल 75.34 लाख आबादी आएगी। इसमें इंदौर जिले की 100% आबादी शामिल है, जबकि उज्जैन की केवल 59% आबादी ही इसके अंतर्गत आएगी।
  • कुल क्षेत्रफल: इन छह जिलों का कुल क्षेत्रफल 33 हजार वर्ग किलोमीटर से ज्यादा है, लेकिन मेट्रोपॉलिटन रीजन के लिए 16,000.87 वर्ग किलोमीटर जमीन को ही नोटिफाई किया गया है।
  • शामिल गांवों का ब्योरा:
    • इंदौर: 654 गांव
    • उज्जैन: 624 गांव
    • देवास: 593 गांव
    • शाजापुर: 546 गांव
    • धार: 224 गांव
    • रतलाम: 140 गांव

💡 क्या होती है मेट्रोपॉलिटन योजना?

आमतौर पर 10 लाख या उससे अधिक आबादी वाले घने शहरी क्षेत्र को महानगर (Metro City) कहा जाता है। इसमें मुख्य शहर और उसके आसपास के इलाके परिवहन, उद्योग और बुनियादी ढांचे के जरिए आपस में जुड़े होते हैं। मेट्रोपॉलिटन योजना का मुख्य उद्देश्य इतने बड़े क्षेत्र में सड़कों, मेट्रो ट्रेन, पानी और उद्योगों का सुव्यवस्थित व एकीकृत विकास करना होता है। लेकिन इंदौर के मामले में मेट्रो ट्रेन के संचालन में हो रही देरी और मास्टर प्लान के लटकने से जनता में पहले ही असंतोष है।

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