drnewsindia.com/सीहोर। हर साल की तरह इस साल भी शहर के विश्रामघाट के समीपस्थ मरीह माता मंदिर पर गुप्त नवरात्रि के पावन अवसर पर दिव्य अनुष्ठान और विशेष हवन पूजन का आयोजन किया जा रहा है। यहां पर सुबह और शाम को आरती की जाती है। इसके अलावा प्रतिदिन मां का विशेष श्रृंगार किया जाता है। नवरात्रि के पहले दिन मंदिर के व्यवस्थापक गोविन्द मेवाड़ा, रोहित मेवाड़ा सहित अन्य ने अन्य श्रद्धालुओं ने पूजा अर्चना की। शारदीय नवरात्र के पहले दिन मंदिर में भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी। माता रानी के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए श्रद्धालु पहुंचे। भक्तों ने जय माता दी के जयकारे लगाकर माता रानी का आशीर्वाद लिया। मंदिरों में घंटियों की गूंज और भक्ति गीतों के बीच पूरा माहौल भक्तिमय नजर आया। मंदिर के व्यवस्थापक श्री मेवाड़ा ने बताया कि प्रतिदिन सुबह यहां पर हवन का आयोजन किया जाएगा। इसके अलावा नवरात्रि में अखंड ज्योत जलाई जाएगी।

इस मौके पर संस्कार मंच के प्रभारी मनोज दीक्षित मामा ने बताया कि पहले दिन जगत जननी आदिशक्ति मां दुर्गा की प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा-अर्चना की जाती है। साधक मां शैलपुत्री के निमित्त व्रत-उपवास करते है। नवरात्रि में सच्चे मन से 10 महाविद्याओं की पूजा करता है तो उसे जीवन के समस्त दुखों से छुटकारा मिल जाता है। सोमवार को मां के दूसरे रूप मां ब्रह्मचारणी की पूजा अर्चना के साथ ही मंदिर परिसर में कन्या पूजन के अलावा लगातार तीन घंटे तक दुर्गा सप्तशती पाठ का आयोजन किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि सनातन शास्त्रों में निहित है कि कालांतर में प्रजापति दक्ष ने जगत जननी आदिशक्ति मां दुर्गा की कठिन तपस्या की। प्रजापति दक्ष की कठिन भक्ति से प्रसन्न होकर मां दुर्गा प्रकट होकर बोली मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूं। मांगों, तुम्हें क्या चाहिए। उस समय प्रजापति दक्ष ने मां को पुत्री रूप में प्राप्त करने का वरदान मांगा। मां दुर्गा यह कहकर अंतर्ध्यान हो गई कि जल्द सती रूप में तुम्हारे घर जन्म लूंगी। कालांतर में प्रजापति दक्ष के घर मां सती की जन्म हुआ। हालांकि, मानवीय रूप में मां सब कुछ भूल गई। एक रात स्वप्न में भगवान शिव आए और उन्हें स्मरण दिलाया। अगले दिन से मां सती भगवान शिव जी की पूजा-उपासना करने लगी। इसी समय प्रजापति दक्ष उनके विवाह हेतु वर ढूंढने लगे, लेकिन मां सती शिव जी को अपना पति मान चुकी थीं। अत: उन्होंने पिता के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। उस समय मां सती की शादी भगवान शिव से हुई। हालांकि, उनके पिता प्रसन्न नहीं थे। अत: भगवान शिव और प्रजापति दक्ष के मध्य वैचारिक द्व्न्द बना रहा। एक बार प्रजापति दक्ष ने महायज्ञ का आयोजन किया। इसमें मां सती को नहीं बुलाया गया। यह जान मां सती व्याकुल हो उठीं। मां सती जाने की जिद करने लगी। भगवान शिव, मां सती की अनुरोध को ठुकरा नहीं सके। हालांकि, पिता के घर पर पहुंचने के बाद उन्हें अपमान सहना पड़ा। उस समय मां सती को आभास हुआ कि उन्होंने आकर गलती कर दी। उस समय उन्होंने यज्ञ वेदी में अपनी आहुति दे दी। कालांतर में मां सती शैलराज हिमालय के घर जन्म लेती हैं। अत: मां शैलपुत्री कहलाती हैं।




