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बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित ₹17.24 करोड़ फर्जी सर्पदंश मुआवजा घोटाले में कार्रवाई तेज हो गई है। तहसील कार्यालय के तीन राजस्व लिपिकों (क्लर्क) की गिरफ्तारी के बाद उन्हें निलंबित कर दिया गया है। वहीं, आठ अन्य कर्मचारियों के बयान अभी दर्ज होने बाकी हैं। इस कार्रवाई के विरोध में छत्तीसगढ़ प्रदेश राजस्व लिपिक संघ और छत्तीसगढ़ कनिष्ठ प्रशासनिक सेवा संघ ने मोर्चा खोल दिया है।
3 क्लर्क गिरफ्तार, 8 कर्मचारियों के बयान बाकी
पुलिस ने तहसील कार्यालय के कर्मचारी गरीब बिंझवार, नरेंद्र कौशिक और हरिराम राठौर को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। इससे पहले गोविंद विश्वकर्मा, वकील खांडेकर और डॉक्टर प्रियंका सोनी सहित कई आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी है। अब पुलिस आठ अन्य कर्मचारियों के बयान दर्ज करेगी।

गिरफ्तारी के विरोध में हड़ताल
लिपिक संघ के नेतृत्व में तहसील कर्मचारियों ने एक दिन की हड़ताल कर गिरफ्तारी का विरोध किया। हड़ताल के कारण सीमांकन, नामांतरण, बंटवारा और अन्य राजस्व कार्य पूरी तरह प्रभावित रहे। दूर-दराज से आए लोगों को बिना काम कराए वापस लौटना पड़ा।
संघ ने निष्पक्ष जांच की मांग उठाई
राजस्व लिपिक संघ ने संभागायुक्त, आईजी और कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। संघ का कहना है कि कर्मचारियों को पहले बयान के लिए बुलाया गया और बाद में गिरफ्तार कर लिया गया। इससे अन्य कर्मचारियों में भय का माहौल है।
संघ का तर्क है कि रीडर और वाचक का काम केवल दस्तावेज प्रस्तुत करना और रिकॉर्ड संभालना होता है, जबकि मुआवजा मंजूर करने का अंतिम अधिकार संबंधित पीठासीन अधिकारी के पास होता है। ऐसे में केवल रीडरों को आरोपी बनाना उचित नहीं है।

सामूहिक अवकाश की चेतावनी
संघ ने चेतावनी दी है कि यदि कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं रोकी गई और उन्हें कानूनी सुरक्षा नहीं दी गई, तो जिले के सभी राजस्व लिपिक सामूहिक अवकाश पर चले जाएंगे। इससे तहसील कार्यालयों का कामकाज प्रभावित हो सकता है।
तबादले की कोशिश में कर्मचारी
जांच का दायरा बढ़ने के साथ ही कई कर्मचारी कार्रवाई के डर से अपना तबादला कराने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं, इस मामले में सात तहसीलदारों को भी नोटिस जारी किया गया है, जिसके विरोध में कनिष्ठ प्रशासनिक सेवा संघ ने भी अधिकारियों को ज्ञापन सौंपा है।

क्या है ₹17 करोड़ का सर्पदंश मुआवजा घोटाला?
जांच में सामने आया कि जशपुर जिले में तीन वर्षों में सर्पदंश से 96 मौतें दर्ज हुईं, जबकि बिलासपुर में 431 मौतें दिखाकर करीब ₹17.24 करोड़ का मुआवजा जारी कर दिया गया।
सरकारी नियमों के अनुसार सर्पदंश से मौत होने पर परिजनों को ₹4 लाख की आर्थिक सहायता मिलती है। आरोप है कि फर्जी दस्तावेज, नकली हस्ताक्षर और झूठे शपथ पत्रों के आधार पर सामान्य मौतों को भी सर्पदंश से हुई मौत बताकर मुआवजा स्वीकृत कराया गया। कई मामलों में परिजनों की जानकारी के बिना ही राशि निकालकर आपस में बांट ली गई।
अब तक 17 गिरफ्तार
इस हाई-प्रोफाइल घोटाले में अब तक डॉक्टर, पुलिसकर्मी और तहसील कर्मचारियों समेत 17 आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। जांच एजेंसियों के अनुसार तथाकथित ‘एडवोकेट डायमंड गैंग’ अस्पतालों में मौत की सूचना मिलते ही सक्रिय हो जाता था और फर्जी सर्पदंश के दस्तावेज तैयार कर मुआवजा राशि हासिल करता था। जांच अभी जारी है।





