सीहोर: सियासत या ‘एफआईआर’ की जंग? 5 महीनों में 9 कांग्रेसी नेताओं पर मुकदमे; आखिर क्या है इसके पीछे की कहानी?

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drnewsindia

सीहोर | 23 जनवरी 2026 सीहोर जिले में भले ही फिलहाल कोई चुनावी बिगुल न बजा हो, लेकिन यहाँ की राजनीति में उबाल चरम पर है। जिले में इन दिनों धरना-प्रदर्शनों से ज्यादा ‘एफआईआर’ (FIR) की चर्चा है। पिछले 5 महीनों का ट्रैक रिकॉर्ड देखें तो सितंबर 2025 से अब तक कांग्रेस के 9 प्रमुख नेताओं और कार्यकर्ताओं पर पुलिस केस दर्ज हो चुके हैं।

एफआईआर मीटर: सितंबर से अब तक का घटनाक्रम

सीहोर की राजनीति में मुकदमों का यह दौर सत्ता और विपक्ष के बीच बढ़ती तल्खी का नतीजा माना जा रहा है।

  • सितंबर 2025: राहुल गांधी के पुतले दहन के दौरान हुए विवाद में कांग्रेस नेता पंकज शर्मा पर मामला दर्ज।
  • जनवरी 2026: हाउसिंग बोर्ड की समस्याओं को लेकर मुखर होने पर कांग्रेस जिलाध्यक्ष के भाई अभिषेक गुजराती पर केस।
  • 9 जनवरी 2026: पीजी कॉलेज स्टाफ की शिकायत पर युवा कांग्रेस जिलाध्यक्ष देवेंद्र ठाकुर, प्रदेश सचिव हरिओम सिसोदिया, यश यादव और तनिश त्यागी पर एफआईआर।
  • हालिया मामला (आष्टा): भाजपा नेत्री की शिकायत पर पार्षद मेहमूद शाह सहित चार कार्यकर्ताओं पर अभद्रता का मुकदमा।

भाजपा का ‘अभेद्य किला’ और कांग्रेस की ‘सेंधमारी’

सीहोर जिला दशकों से भाजपा का पावर सेंटर रहा है। वर्तमान में जिले की चारों विधानसभा सीटों पर भाजपा का कब्जा है:

  • इछावर: राजस्व मंत्री करण सिंह वर्मा का 40 साल पुराना वर्चस्व।
  • सीहोर: 35-40 सालों से कांग्रेस की जीत का इंतजार।
  • बुदनी और आष्टा: भाजपा के सबसे मजबूत गढ़।

बड़ा बदलाव: पिछले साल हुए बुदनी उपचुनाव ने समीकरण बदल दिए हैं। भाजपा की जीत के बावजूद उसके 90,000 वोटों का नुकसान हुआ है, जिसने कांग्रेस के हौसलों को उड़ान दी है।


दमन या छटपटाहट? राजनीतिक गलियारों में चर्चा

जिले के राजनीतिक पंडित इस स्थिति को दो नजरियों से देख रहे हैं:

  1. विपक्ष का तर्क: कांग्रेस का आरोप है कि उनकी बढ़ती सक्रियता और जनता के मुद्दों को उठाने से घबराकर भाजपा प्रशासन का दुरुपयोग कर रही है।
  2. सत्ता पक्ष का रुख: भाजपा नेताओं का कहना है कि कांग्रेस कार्यकर्ता मर्यादा भूलकर अभद्रता और शासकीय कार्यों में बाधा डाल रहे हैं, जिसके कारण कानूनी कार्रवाई हो रही है।

विश्लेषण: क्यों आक्रामक है कांग्रेस?

बुदनी उपचुनाव में मिली “नैतिक बढ़त” के बाद कांग्रेस अब आर-पार के मूड में है। पेयजल, बेरोजगारी और स्थानीय समस्याओं को लेकर कांग्रेस लगातार सड़कों पर है। नेताओं पर दर्ज हो रहे मुकदमे कार्यकर्ताओं के बीच एक ‘सिम्पैथी कार्ड’ या ‘संघर्ष की छवि’ बनाने का जरिया भी बन रहे हैं।

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