तमिलनाडु: सामाजिक न्याय की ‘प्रयोगशाला’ में हाशिए पर ब्राह्मण सियासत; आखिर क्यों दिग्गज दलों ने फेरा मुंह?

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drnewsindia.com

चेन्नई। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 के रण में एक ऐसा चौंकाने वाला पैटर्न सामने आया है, जिसने राज्य की दशकों पुरानी सियासी परंपरा को बदल कर रख दिया है। द्रविड़ विचारधारा के प्रभाव और जातिगत समीकरणों के चलते इस बार राज्य के मुख्य दलों ने ब्राह्मण प्रत्याशियों से पूरी तरह किनारा कर लिया है।

📊 टिकट वितरण का चौंकाने वाला गणित

तमिलनाडु की 234 सीटों पर मुख्य गठबंधनों का रुख कुछ इस प्रकार रहा:

गठबंधन / दलकुल सीटेंब्राह्मण उम्मीदवार
इंडिया गठबंधन (DMK + कांग्रेस)164 + 28शून्य (0)
NDA गठबंधन (AIADMK + BJP)178 + 27शून्य (0)
TVK (थलपति विजय की पार्टी)02
NTK (सीमन की पार्टी)06

❓ क्यों ब्राह्मणों से दूरी बना रहे हैं सियासी दल?

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इसके पीछे चार प्रमुख कारण हैं:

  1. सामाजिक न्याय और द्रविड़ विचारधारा: तमिलनाडु पेरियार के ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की भूमि है। यहाँ की राजनीति ‘ब्राह्मणवाद’ के विरोध पर टिकी है। DMK और AIADMK जैसी पार्टियाँ अपनी वैचारिक जड़ों के कारण ब्राह्मणों को टिकट देना जोखिम भरा मानती हैं।
  2. वोट बैंक का गणित: राज्य में ब्राह्मणों की आबादी मात्र 3% है। मुथुराय्यर, थेवर, वन्नियार और गौंडर जैसी जातियों की संख्या अधिक होने के कारण दल ‘जीतने की क्षमता’ (Winnability) के आधार पर बहुसंख्यक पिछड़ी जातियों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
  3. BJP का नया स्टैंड: आश्चर्यजनक रूप से, ब्राह्मणों का समर्थन पाने वाली बीजेपी ने भी अपने कोटे की 27 सीटों में से किसी पर ब्राह्मण चेहरा नहीं उतारा। माना जा रहा है कि बीजेपी राज्य में अपनी छवि ‘उच्च जाति की पार्टी’ से बदलकर ‘OBC और दलित समर्थक’ बनाने की कोशिश में है।
  4. जयललिता के बाद का बदलाव: AIADMK में जयललिता (जो स्वयं ब्राह्मण थीं) के निधन के बाद ब्राह्मणों का झुकाव बीजेपी की तरफ बढ़ा है। इसी ‘चुनावी लाभ’ की कमी को देखते हुए AIADMK ने भी इस बार दूरी बना ली है।

💡 नई पार्टियों का ‘दांव’

जहाँ बड़े दल पीछे हटे हैं, वहीं नए खिलाड़ियों ने अलग राह चुनी है:

  • थलपति विजय (TVK): अभिनेता से नेता बने विजय ने 2 ब्राह्मण उम्मीदवार उतारकर सबको चौंका दिया है।
  • सीमन (NTK): ‘द्रविड़ दीवार’ गिराने का नारा देने वाले सीमन ने 6 ब्राह्मण प्रत्याशी उतारे हैं, खासकर मायिलापुर और श्रीरंगम जैसे क्षेत्रों में जहाँ ब्राह्मण वोटर निर्णायक भूमिका में हैं।

🏛️ निष्कर्ष: क्या ब्राह्मण राजनीति पूरी तरह खत्म हो गई?

विशेषज्ञों का मानना है कि तमिलनाडु में 69% आरक्षण और द्रविड़ विमर्श इतना गहरा है कि ब्राह्मणों को अक्सर ‘बाहरी’ या ‘आर्य’ के रूप में पेश किया जाता है। ऐसे में मुख्यधारा के दलों को डर है कि ब्राह्मण उम्मीदवार उतारने से उनका मुख्य आधार (OBC और SC/ST वोट) नाराज हो सकता है। फिलहाल, तमिलनाडु की सत्ता की चाबी पिछड़ी जातियों के हाथ में ही नजर आ रही है।

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