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नई दिल्ली। देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें कम होंगी या नहीं, इसे लेकर कयासों का बाजार गर्म है। इस बीच केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने गुरुवार को एक बड़ा बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कीमतों में कटौती पर अंतिम फैसला अगले दो-तीन महीनों के बाद ही लिया जा सकता है, अभी इस पर कुछ भी कहना संभव नहीं है।
केंद्रीय मंत्री ने बताया कि ईरान युद्ध के समय जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) के दाम आसमान छू रहे थे, तब भारतीय सरकारी तेल कंपनियों ने महंगे दामों पर तेल खरीदा था। देश की रिफाइनरियां अभी उसी महंगे स्टॉक को प्रोसेस कर रही हैं, जिसकी वजह से तुरंत राहत देना मुमकिन नहीं है।
🔥 तेल बाजार के 4 सबसे बड़े अपडेट्स (Key Points):
- अगले 2-3 महीने अहम: अमेरिका और ईरान के बीच समझौते के बाद क्रूड ऑयल के दाम गिरकर वापस 70 डॉलर प्रति बैरल पर आ गए हैं। अगर यह राहत अगले 2 से 3 महीने तक बनी रही, तो सरकारी कंपनियां दाम घटा सकती हैं।
- सरकारी कंपनियों को भारी नुकसान: लागत से कम दाम पर ईंधन बेचने के कारण देश की सरकारी तेल कंपनियों (OMCs) को 30 जून तक कुल 74,781 करोड़ रुपए का भारी नुकसान उठाना पड़ा है।
- प्राइवेट कंपनी ‘नायरा’ ने घटाए दाम: जहाँ सरकारी कंपनियां अभी पुराने घाटे की भरपाई कर रही हैं, वहीं देश की सबसे बड़ी प्राइवेट फ्यूल रिटेलर कंपनी ‘नायरा एनर्जी’ (Nayara Energy) ने पेट्रोल में ₹5 और डीजल में ₹3 प्रति लीटर की बड़ी कटौती कर दी है।
- भोपाल में नया रेट: नायरा के इस फैसले के बाद भोपाल में उनका पेट्रोल 119.79 रुपए से घटकर 114.79 रुपए और डीजल 102.57 रुपए से घटकर 99.57 रुपए प्रति लीटर पर आ गया है।

📊 अप्रैल-जून तिमाही का पूरा ब्योरा: कंपनियों को कहाँ कितना हुआ नुकसान?
पेट्रोलियम मंत्री ने चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही के दौरान तेल कंपनियों को हुए नुकसान (Under-Recovery) का पूरा गणित सामने रखा है:
- डीजल पर सबसे बड़ी मार: इस तिमाही में सिर्फ डीजल बेचने पर कंपनियों को 1.44 लाख करोड़ रुपए की अंडर-रिकवरी हुई।
- पेट्रोल पर नुकसान: पेट्रोल की बिक्री पर कंपनियों को 19,905 करोड़ रुपए का घाटा हुआ।
- रसोई गैस (LPG): अप्रैल से जून के बीच एलपीजी पर 24,148 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। अगर पिछले साल के एलपीजी घाटे को भी जोड़ दिया जाए, तो कुल रसोई गैस घाटा 2.1 लाख करोड़ रुपए तक पहुँच जाता है।
💡 आसान भाषा में समझें: क्या होती है ‘अंडर-रिकवरी’?
जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम तेजी से बढ़ते हैं, लेकिन घरेलू बाजार में आम जनता को महंगाई से बचाने के लिए सरकारी तेल कंपनियां (IOC, BPCL, HPCL) पेट्रोल-डीजल के दाम उस अनुपात में नहीं बढ़ाती हैं, तो लागत और बिक्री मूल्य के बीच के इस अंतर या नुकसान को ‘अंडर-रिकवरी’ कहा जाता है।

मई में बढ़ी थीं कीमतें, सरकारी आउटलेट्स पर अभी बदलाव नहीं
आपको याद दिला दें कि इसी साल मई महीने में देश की तीनों प्रमुख सरकारी तेल कंपनियों ने अंतरराष्ट्रीय बाजार के दबाव में आकर किस्तों में पेट्रोल और डीजल दोनों के दामों में कुल ₹7.50-₹7.50 प्रति लीटर की बढ़ोतरी की थी। देश के 1 लाख से ज्यादा पेट्रोल पंपों में से 90% से अधिक पर इन्हीं तीन सरकारी कंपनियों का नियंत्रण है और इन्होंने फिलहाल पुरानी कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया है।
अब सबकी नजरें अंतरराष्ट्रीय बाजार पर टिकी हैं। यदि कच्चे तेल के दाम 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास स्थिर रहते हैं, तो आने वाले त्योहारों के सीजन में आम जनता को बड़ी राहत मिल सकती है।
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