सीहोर: एंबुलेंस के इंतजार में मासूम ने तोड़ा दम, प्रसूता को लेने पहुंची गाड़ी धक्का लगाने पर भी नहीं हुई स्टार्ट; स्वास्थ्य सेवाएं वेंटिलेटर पर!

0
4

drnewsindia.com

सीहोर। मरीजों की जिंदगी बचाने के लिए बनाई गई आपातकालीन 108 और शासकीय एंबुलेंस सेवा सीहोर जिले में खुद ‘वेंटिलेटर’ पर नजर आ रही है। बीते 24 घंटे के भीतर जिले में सामने आईं दो गंभीर घटनाओं ने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है। एक तरफ जिला अस्पताल में समय पर एंबुलेंस न मिलने से 5 वर्षीय मासूम की जान चली गई, वहीं दूसरी तरफ प्रसव पीड़ा से तड़प रही महिला को लेने पहुंची एंबुलेंस को चालू करने के लिए ग्रामीण धक्का लगाते नजर आए।

इन दोनों घटनाओं ने पूरे जिले को झकझोर कर रख दिया है और जनता में भारी आक्रोश है।

पहली घटना: समय पर नहीं मिली ALS एंबुलेंस, तड़प-तड़प कर मासूम ने तोड़ा दम

राजगढ़ जिले के कुरावर क्षेत्र से एक 5 वर्षीय गंभीर बच्चे को लेकर उसके परिजन सीहोर जिला अस्पताल पहुंचे थे। यहाँ डॉक्टरों ने बच्चे की नाजुक हालत को देखते हुए उसे तत्काल भोपाल रेफर कर दिया।

परिजनों का आरोप है कि बच्चे को भोपाल ले जाने के लिए आवश्यक एडवांस्ड लाइफ सपोर्ट (ALS) एंबुलेंस समय पर उपलब्ध नहीं हो सकी। परिजन मिन्नतें करते रहे और एंबुलेंस का इंतजार करते-करते मासूम ने अस्पताल में ही दम तोड़ दिया। बेटे की मौत से टूटी और आक्रोशित मां का सब्र का बांध टूट गया और उसने अस्पताल परिसर में खड़ी गाड़ियों पर पत्थर मारकर अपना दुख और गुस्सा जाहिर किया।

दूसरी घटना: प्रसूता को लेने पहुंची एंबुलेंस हुई खराब, ग्रामीणों ने लगाया धक्का

दूसरी हैरान करने वाली घटना इछावर विधानसभा के ग्राम मोगराराम की है। यहाँ शुक्रवार रात एक गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा होने पर परिजनों ने 108 को कॉल किया। एंबुलेंस गांव तो पहुंच गई, लेकिन जब मरीज को लेकर अस्पताल रवाना होना था, तो वह स्टार्ट ही नहीं हुई।

इसके बाद रात के अंधेरे में एंबुलेंस चालक और ग्रामीण काफी देर तक गाड़ी को धक्का लगाते रहे, लेकिन कबाड़ हो चुका वाहन टस से मस नहीं हुआ। अंततः काफी देर बाद दूसरी एंबुलेंस बुलानी पड़ी, तब कहीं जाकर प्रसूता को अस्पताल पहुंचाया जा सका। गनीमत रही कि कोई अनहोनी नहीं हुई।

आंकड़ों में पोल: 13 में से 3 शासकीय एंबुलेंस पूरी तरह कंडम

इस बदहाली के पीछे जब जिले की एंबुलेंस व्यवस्था के आंकड़ों को देखा गया, तो चौंकाने वाली स्थिति सामने आई:

  • स्वास्थ्य विभाग के पास 108 से अलग कुल 13 शासकीय एंबुलेंस हैं, जिनमें से 3 वाहन पूरी तरह कंडम हो चुके हैं।
  • बचे हुए अधिकांश शासकीय वाहन 4 से लेकर 23 वर्ष पुराने हैं, जो अपनी तय उम्र पार कर चुके हैं।
  • वहीं, जिले में संचालित 41 ‘108 एंबुलेंस’ में से भी लगभग 7 वाहनों की स्थिति बेहद खराब और खटारा है।

व्यवस्था पर खड़े होते गंभीर सवाल:

  1. जब जिले की अधिकांश एंबुलेंस अपनी निर्धारित उम्र पूरी कर चुकी हैं, तो समय रहते नए वाहनों की मांग क्यों नहीं की गई?
  2. जिला अस्पताल जैसे संवेदनशील स्थान पर गंभीर मरीजों के लिए ‘स्टैंडबाय’ एंबुलेंस की मुस्तैद व्यवस्था क्यों नहीं है?
  3. यदि कागजों पर एंबुलेंस के मेंटेनेंस का दावा किया जाता है, तो ऐन वक्त पर एंबुलेंस धक्कामार कैसे साबित हो रही हैं?

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here