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मुंबई के रेस्टोरेंट पर FDA का चाबुक, बॉम्बे हाईकोर्ट ने लगाई रोक: तुकाराम मुंढे के एक्शन पर उठे सवाल
खाद्य सुरक्षा कानून की धारा 32 का उल्लंघन और पक्षपातपूर्ण कार्रवाई को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने FDA को लगाई फटकार; 9 से अधिक प्रतिष्ठानों को मिली राहत।
महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) के आयुक्त तुकाराम मुंढे (Tukaram Mundhe) का कड़क एक्शन मोड पूरे राज्य में चर्चा में है। पिछले तीन महीनों से खाद्य सुरक्षा और मिलावटखोरी के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के तहत राज्यभर के कई नामी रेस्टोरेंट, फोर-स्टार होटल, डेयरियों और मिठाई दुकानों को सील किया गया। हालांकि, बिना पूर्व चेतावनी सीधे दुकानें बंद कराने के खिलाफ व्यापारी अदालत पहुंचे, जहां बॉम्बे हाईकोर्ट ने FDA की इस कार्रवाई पर रोक लगाते हुए सख्त रुख अपनाया है।
“दवा बीमारी से ज्यादा खतरनाक नहीं हो सकती” — बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट की मुंबई, नागपुर और औरंगाबाद पीठों ने पिछले एक महीने में कम से कम 9 मामलों में FDA के लाइसेंस निलंबन आदेशों पर रोक लगाई है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवींद्र वी. घुगे की पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि FDA का काम सराहनीय है, लेकिन दवा बीमारी से ज्यादा खतरनाक नहीं होनी चाहिए। कोर्ट ने साफ किया कि टूटी टाइल्स, फर्श पर फिसलन या किचन में 1-2 कीड़े मिलना जनस्वास्थ्य के लिए ऐसा तात्कालिक खतरा नहीं है कि बिना चेतावनी सीधे व्यवसाय बंद करा दिया जाए।
क्या कहता है खाद्य सुरक्षा कानून (FSS Act)?
इस विवाद के केंद्र में खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम की धारा 32 है, जिसके तहत कानूनी प्रक्रिया निर्धारित है:
- सुधार नोटिस (Improvement Notice): धारा 32(1) के अनुसार, किसी भी खामी पर अधिकारी को पहले लिखित नोटिस देकर सुधार के लिए कम से कम 14 दिनों का समय देना अनिवार्य है।
- कारण बताओ नोटिस (Show-Cause Notice): 14 दिनों में सुधार न होने पर ही लाइसेंस निलंबन या रद्दीकरण की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।
- तत्काल निलंबन (Immediate Suspension): धारा 32(3) के तहत बिना नोटिस तुरंत कार्रवाई केवल तभी संभव है जब जनस्वास्थ्य के लिए कोई गंभीर और सीधा खतरा मौजूद हो। अदालत के अनुसार, FDA ने इस अपवाद का अनुचित उपयोग किया।
सरकारी कैंटीन बनाम निजी रेस्टोरेंट: हाईकोर्ट ने पूछा—”समानता कहां है?”
दक्षिण मुंबई के प्रसिद्ध पूर्णिमा रेस्टोरेंट (Poornima Restaurant) और नवी मुंबई के एक होटल की याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने दोहरा मापदंड अपनाने पर FDA को घेरा। कोर्ट ने पाया कि जहां निजी रेस्टोरेंटों में घंटों जांच की गई, वहीं मंत्रालय और विधान भवन की सरकारी कैंटीनों का निरीक्षण महज 30-40 मिनट में पूरा कर दिया गया। जब कोर्ट-नियुक्त वकीलों ने मंत्रालय कैंटीन का दौरा किया, तो वहां भी कॉकरोच और खामियां पाई गईं। इस पर कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि VVIP हो या आम नागरिक, कोई भी कानून से ऊपर नहीं है।

किन-किन प्रमुख प्रतिष्ठानों पर गिरी गाज और कोर्ट से मिली राहत?
FDA के इस अभियान के दौरान मुंबई और राज्यभर के कई प्रतिष्ठित व्यावसायिक संस्थान प्रभावित हुए:
- पूर्णिमा रेस्टोरेंट (Poornima Restaurant, फोर्ट): फोर्ट इलाके के 60 साल पुराने प्रसिद्ध उडुपी रेस्टोरेंट पर कार्रवाई के बाद हाईकोर्ट के हस्तक्षेप पर FDA ने निलंबन को सुधार नोटिस में बदला।
- पारसी डेअरी फार्म (Parsi Dairy Farm, दक्षिण मुंबई): 110 साल पुरानी ऐतिहासिक डेअरी के लाइसेंस निलंबन पर काफी विवाद हुआ, जिसके बाद मामला अदालत पहुंचा।
- होटल पवन बार एंड रेस्टोरेंट (नवी मुंबई): बेलापुर स्थित इस फोर-स्टार होटल में 100% अनुपालन सुधार के बाद भी ढिलाई बरतने पर हाईकोर्ट ने FDA को फटकार लगाई और तुरंत लाइसेंस बहाल किया।
- के. रुस्तम एंड कंपनी (K. Rustom & Co., चर्चगेट) व नूर मोहम्मदी होटल: दक्षिण मुंबई के इन प्रसिद्ध खाद्य केंद्रों पर भी निलंबन की कार्रवाई की गई।
- गोरस भंडार (Goras Bhandar, वर्धा): 80 साल पुरानी मिठाई और डेअरी दुकान को नागपुर बेंच ने राहत दी और केवल जोखिम वाले उत्पाद (छाछ) को रोककर बाकी व्यापार चालू रखने का आदेश दिया।
- दुग्ध प्रसंस्करण इकाइयां (औरंगाबाद क्षेत्र): औरंगाबाद बेंच ने कई दूध विक्रेताओं के निलंबन पर रोक लगाते हुए बिना नोटिस सीधे बंदी को गैर-कानूनी ठहराया।

- कानूनी राहत: बॉम्बे हाईकोर्ट ने 9 से अधिक मामलों में FDA के सीधे निलंबन आदेशों को सुधार नोटिस में बदलने का निर्देश दिया।
- कानून का पालन: टूटी टाइल्स या मामूली स्वच्छता संबंधी कमियों पर धारा 32 के तहत पहले 14 दिन का ‘इम्प्रूवमेंट नोटिस’ देना अनिवार्य है।
- समान मापदंड: अदालत ने सरकारी कैंटीनों और निजी व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लिए एक समान जांच प्रक्रिया लागू करने के निर्देश दिए।
तुकाराम मुंढे के मिलावट-विरोधी अभियान को जनता का समर्थन मिला है, लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसलों ने स्पष्ट कर दिया है कि जनस्वास्थ्य की सुरक्षा के नाम पर तय कानूनी प्रक्रिया (Due Process) की अनदेखी नहीं की जा सकती। प्रशासन को सख्त नियमों के साथ-साथ व्यापारियों के आजीविका के अधिकार का भी संतुलन बनाना होगा।




