नई दिल्ली। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में खेती के साथ पशुपालन किसानों और पशुपालकों की आय का महत्वपूर्ण साधन है। गांवों में बड़ी संख्या में पशु होने के कारण हर दिन गोबर और अन्य जैविक कचरा भी निकलता है। अगर इस कचरे का सही तरीके से प्रबंधन न किया जाए तो यह आसपास गंदगी फैलाने के साथ कई तरह की समस्याओं का कारण बन सकता है। वहीं, इसी जैविक कचरे को संसाधन के रूप में इस्तेमाल किया जाए तो इससे खाद और ऊर्जा जैसे उपयोगी उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं।
क्या है गोबरधन योजना?
गोबरधन का पूरा नाम Galvanizing Organic Bio-Agro Resources Dhan है। इस पहल की शुरुआत वर्ष 2018 में की गई थी। योजना को गांवों में जैविक और ठोस कचरे के बेहतर प्रबंधन से जोड़ा गया है। इसका उद्देश्य पशुओं के गोबर तथा अन्य जैविक संसाधनों को बेकार समझकर खुले में फेंकने के बजाय उनका उपयोगी तरीके से इस्तेमाल करना है।
ग्रामीण इलाकों में पशुओं का गोबर रोजाना निकलने वाला जैविक संसाधन है। इसके अलावा खेतों से निकलने वाले फसल अवशेष और गांवों से निकलने वाला गीला जैविक कचरा भी उपलब्ध रहता है। इन संसाधनों को उचित प्रक्रिया के जरिए बायोगैस और जैविक खाद में बदला जा सकता है।
गोबर से बन सकती है बायोगैस
गोबरधन योजना का एक प्रमुख पहलू गोबर और दूसरे जैविक कचरे से बायोगैस तैयार करना है। बायोगैस एक प्रकार का ईंधन है, जिसे जैविक पदार्थों के अपघटन की प्रक्रिया से तैयार किया जाता है। पशुओं के गोबर को इस प्रक्रिया में इस्तेमाल किया जा सकता है।
गांवों में यदि उचित क्षमता का बायोगैस प्लांट स्थापित किया जाता है तो वहां उपलब्ध गोबर और जैविक कचरे को ऊर्जा में बदला जा सकता है। इससे कचरे के निपटान की समस्या कम करने के साथ ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है।
योजना से जुड़े बड़े स्तर के प्रयासों में Compressed Biogas यानी CBG का उत्पादन भी महत्वपूर्ण है। CBG को जैविक कचरे से तैयार किया जा सकता है और इसे स्वच्छ ईंधन के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
कुल मिलाकर गोबरधन योजना ग्रामीण भारत में जैविक कचरे को उपयोगी संसाधन में बदलने की अवधारणा पर आधारित महत्वपूर्ण पहल है। पशुओं का गोबर, फसल अवशेष और अन्य जैविक कचरा यदि व्यवस्थित तरीके से एकत्रित और संसाधित किया जाए तो इससे बायोगैस, CBG और जैविक खाद जैसे उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं।




