नई दिल्ली। हिंदू धर्म में करवाचौथ का व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, सुखी वैवाहिक जीवन और परिवार की खुशहाली की कामना के साथ व्रत रखती हैं। करवाचौथ के दिन पूरे दिन निर्जला व्रत रखने के बाद शाम को विधि-विधान से पूजा की जाती है और चंद्रमा के दर्शन के बाद व्रत खोलने की परंपरा है।करवाचौथ की पूजा में चंद्रमा को अर्घ्य देना सबसे महत्वपूर्ण परंपराओं में से एक माना जाता है। चंद्रमा के दर्शन होने के बाद उन्हें जल अर्पित किया जाता है। इसके बाद महिलाएं छलनी से पहले चंद्रमा और फिर अपने पति का चेहरा देखने की परंपरा निभाती हैं। अंत में पति के हाथों से पानी और मिठाई ग्रहण कर व्रत खोला जाता है।
चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा
करवाचौथ के दिन महिलाएं दिनभर व्रत रखने के बाद शाम को करवाचौथ की पूजा करती हैं। पूजा के दौरान व्रत की कथा सुनने की भी परंपरा है। कथा और पूजा के बाद सभी को चंद्रमा के उदय होने का इंतजार रहता है।
आचार्य मदन मोहन के अनुसार, चंद्रोदय के बाद ही चंद्रमा को अर्घ्य देना चाहिए। इसके लिए एक कलश में जल लिया जाता है। इस जल में अक्षत यानी चावल और चांदी का सिक्का रखा जा सकता है। इसके बाद चंद्रमा के दर्शन करके उन्हें जल अर्पित किया जाता है।
यहां यह ध्यान रखना जरूरी है कि चंद्रमा को अर्घ्य देने की विधि अलग-अलग परिवारों और परंपराओं में कुछ हद तक अलग हो सकती है। इसलिए श्रद्धालु अपने परिवार की पारंपरिक पूजा-पद्धति का भी पालन कर सकते हैं।
करवाचौथ की पूजा में कथा का महत्व
चंद्रमा को अर्घ्य देने से पहले करवाचौथ की पूजा और कथा सुनने की परंपरा है। व्रत रखने वाली महिलाएं शाम के समय पूजा की तैयारी करती हैं और करवाचौथ की कथा सुनती हैं।
कथा के बाद चंद्रमा के उदय होने का इंतजार किया जाता है। जैसे ही चंद्रमा दिखाई देते हैं, महिलाएं उनके दर्शन करती हैं और निर्धारित परंपरा के अनुसार अर्घ्य देती हैं। इसके बाद छलनी से चंद्रमा और पति का चेहरा देखने की रस्म पूरी की जाती है।
इस प्रकार करवाचौथ की पूजा में दिनभर के व्रत के साथ शाम की पूजा, कथा, चंद्र दर्शन, अर्घ्य और व्रत खोलने की प्रक्रिया महत्वपूर्ण मानी जाती है।
करवाचौथ की पूरी परंपरा का सार
करवाचौथ पर महिलाएं पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से व्रत रखती हैं। शाम को पूजा और कथा के बाद चंद्रमा के दर्शन किए जाते हैं। चंद्रोदय होने पर कलश के जल में अक्षत और चांदी का सिक्का रखकर चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा बताई गई है।
इसके बाद छलनी से पहले चंद्रमा और फिर पति का चेहरा देखने की रस्म निभाई जाती है। अंत में पति के हाथों से पानी और मिठाई ग्रहण करके व्रत खोला जाता है।




