रांची। झारखंड में अगली बड़ी राजनीतिक लड़ाई भले ही अभी कुछ समय दूर हो, लेकिन भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने राज्य में अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने की तैयारियां तेज कर दी हैं। पार्टी की रणनीति में केवल चुनावी गठबंधन और सीटों के गणित पर निर्भर रहने के बजाय संगठन को मजबूत करना, अलग-अलग सामाजिक समूहों तक पहुंच बढ़ाना और क्षेत्रवार राजनीतिक समीकरणों को समझना शामिल है। इसी क्रम में केंद्रीय नेतृत्व की सक्रियता भी बढ़ी है और राज्य के वरिष्ठ नेताओं के साथ महत्वपूर्ण बैठकों का दौर जारी है।
अमित शाह के साथ वरिष्ठ नेताओं की बैठक से बढ़ी राजनीतिक हलचल
हाल ही में नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ झारखंड भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की बैठक हुई। बैठक में प्रदेश संगठन से जुड़े नेताओं के साथ पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा, रघुवर दास और चंपाई सोरेन भी शामिल रहे। बैठक को झारखंड में भाजपा की आगे की राजनीतिक रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
बैठक में राज्य से जुड़े विभिन्न राजनीतिक मुद्दों के साथ खनन क्षेत्र से संबंधित प्रस्तावित कानूनी बदलाव और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) की ओर से चलाए जा रहे अथवा प्रस्तावित आंदोलनों पर चर्चा हुई। ऐसे मुद्दे झारखंड की राजनीति में खास महत्व रखते हैं, क्योंकि राज्य की अर्थव्यवस्था और राजनीतिक विमर्श में खनिज संसाधन लंबे समय से प्रमुख विषय रहे हैं।
आदिवासी और सामाजिक समीकरणों पर विशेष नजर
झारखंड की राजनीति में आदिवासी समुदाय की भूमिका महत्वपूर्ण है। राज्य में बड़ी संख्या में विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं जहां आदिवासी मतदाता चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए भाजपा की रणनीति में आदिवासी क्षेत्रों में संगठन को मजबूत करना और स्थानीय नेतृत्व को अधिक सक्रिय करना अहम विषय है।
पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा और चंपाई सोरेन जैसे नेताओं की राजनीतिक पृष्ठभूमि भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। चंपाई सोरेन का झारखंड की क्षेत्रीय राजनीति में लंबा अनुभव रहा है, जबकि अर्जुन मुंडा राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री होने के साथ राष्ट्रीय राजनीति में भी सक्रिय रहे हैं। रघुवर दास भी झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हैं और संगठन तथा सरकार दोनों स्तरों पर लंबा राजनीतिक अनुभव रखते हैं।




