लखनऊ। कृषि क्षेत्र में मौसम और प्राकृतिक आपदाओं का जोखिम हमेशा बना रहता है। बारिश की अनिश्चितता, सूखा, बाढ़, ओलावृष्टि, चक्रवात और अन्य निर्धारित प्राकृतिक जोखिमों के कारण किसानों को कई बार फसल तैयार होने से पहले या कटाई के आसपास नुकसान उठाना पड़ता है। ऐसे समय में फसल का नुकसान केवल खेत तक सीमित नहीं रहता, बल्कि किसान की आय, अगली फसल की तैयारी और कृषि गतिविधियों पर भी असर डाल सकता है। इसी जोखिम को कम करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) लागू की गई है।
अधिसूचित फसलों और जोखिमों को मिलता है बीमा कवरेज
PMFBY के तहत सभी फसलें अपने आप बीमित नहीं होतीं। राज्य सरकार द्वारा संबंधित मौसम, क्षेत्र और परिस्थितियों के अनुसार कुछ फसलों को अधिसूचित किया जाता है। इन्हीं अधिसूचित फसलों और निर्धारित क्षेत्रों के लिए योजना के नियमों के अनुसार बीमा कवरेज उपलब्ध होता है।
योजना में ऐसे जोखिम शामिल किए जा सकते हैं जिनसे फसल की बुवाई प्रभावित हो, खड़ी फसल को प्राकृतिक आपदा से नुकसान पहुंचे या निर्धारित परिस्थितियों में कटाई के बाद फसल को नुकसान हो। हालांकि किस फसल, क्षेत्र और मौसम में कौन-कौन से जोखिम लागू होंगे, यह संबंधित अधिसूचना और योजना के प्रावधानों पर निर्भर करता है।
फसल खराब होने पर आर्थिक जोखिम को कम करने में मदद
किसान के लिए फसल नुकसान का मतलब केवल उत्पादन में कमी नहीं है। खेती में बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी और अन्य लागत पहले ही लगाई जा चुकी होती है। यदि प्राकृतिक जोखिम के कारण उत्पादन प्रभावित हो जाता है, तो किसान की आर्थिक स्थिति पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
PMFBY इसी आर्थिक जोखिम को कम करने की दिशा में काम करती है। योजना का उद्देश्य फसल नुकसान के बाद पात्र किसानों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत बीमा दावा उपलब्ध कराना है, ताकि किसान अपनी कृषि गतिविधियों को जारी रखने में सहायता प्राप्त कर सके। यह सहायता किसान को अगले कृषि चक्र की तैयारी में भी आर्थिक सहारा दे सकती है।
कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश में 2016-17 से लागू प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना किसानों को प्राकृतिक आपदाओं और योजना में शामिल अन्य निर्धारित जोखिमों से होने वाले फसल नुकसान के आर्थिक प्रभाव को कम करने में मदद करने के उद्देश्य से संचालित है। किसान प्रीमियम का निर्धारित हिस्सा देते हैं और पात्र प्रीमियम पर सरकार की सब्सिडी व्यवस्था रहती है। साथ ही, डिजिटल प्लेटफॉर्म और आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल से पंजीकरण, फसल निगरानी, नुकसान के आकलन और दावों के निपटारे की प्रक्रिया को बेहतर बनाने का प्रयास किया जा रहा है।




