पटाखों पर पूरी तरह बैन नहीं, 24 घंटे आतिशबाजी की भी इजाजत नहीं; सुप्रीम कोर्ट ने सुझाया बीच का रास्ता

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नई दिल्ली। पटाखों और आतिशबाजी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को महत्वपूर्ण टिप्पणी की। जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने कहा कि पटाखों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाना उचित रास्ता नहीं होगा, क्योंकि इससे लोगों की भावनाएं आहत हो सकती हैं। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इसका अर्थ यह नहीं है कि लोगों को दिन के 24 घंटे पटाखे चलाने की अनुमति दी जा सकती है। कोर्ट ने पटाखों के इस्तेमाल के लिए निर्धारित समय तय करने की दिशा में बीच का रास्ता अपनाने की बात कही। सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार दोनों न्यायाधीश 30 सितंबर 2026 को कोर्ट नंबर 3 की पीठ में शामिल थे।

पूरी तरह प्रतिबंध और 24 घंटे आतिशबाजी, दोनों पर संतुलित रुख

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का मुख्य केंद्र पटाखों के इस्तेमाल को लेकर संतुलन बनाने पर रहा। अदालत के सामने एक ओर पटाखों से जुड़े प्रदूषण और उसके संभावित प्रभावों की चिंता है, वहीं दूसरी ओर त्योहारों और आतिशबाजी से जुड़ी लोगों की भावनाओं का पक्ष भी मौजूद है।

पीठ ने कहा कि वह न तो पटाखों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के लिए तैयार है और न ही पूरे दिन आतिशबाजी की अनुमति देने के पक्ष में है। अदालत के अनुसार, अगर दिन के 24 घंटे पटाखे चलाने की अनुमति दी जाती है तो इससे बुजुर्गों, बीमार लोगों और बच्चों समेत अन्य जीवित प्राणियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

इसीलिए कोर्ट ने समय निर्धारित करने को एक संभावित संतुलित व्यवस्था के रूप में देखा। इसका उद्देश्य यह है कि लोगों को त्योहारों और धार्मिक-सामाजिक अवसरों पर पटाखे चलाने का अवसर मिले, लेकिन इसका समय इतना सीमित हो कि इसका प्रभाव अन्य लोगों के जीवन और स्वास्थ्य पर कम से कम पड़े।

पटाखों से जुड़े प्रदूषण का मुद्दा

पटाखों के इस्तेमाल पर बहस का एक प्रमुख कारण वायु और ध्वनि प्रदूषण है। आतिशबाजी के दौरान निकलने वाला धुआं और विभिन्न प्रकार के कण वातावरण की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं। इसी तरह तेज आवाज वाले पटाखों से ध्वनि प्रदूषण की समस्या भी पैदा होती है।

प्रदूषण का असर सभी लोगों पर एक जैसा नहीं होता। विशेष रूप से छोटे बच्चों, बुजुर्गों और पहले से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए अत्यधिक धुआं और शोर परेशानी का कारण बन सकता है। यही कारण है कि पटाखों को लेकर अदालतों और प्रशासन की ओर से समय-समय पर नियम और प्रतिबंध तय किए जाते रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा टिप्पणी में भी इसी व्यापक चिंता का उल्लेख हुआ। अदालत ने कहा कि पूरे दिन पटाखे चलाने से बुजुर्गों, बीमारों और बच्चों के साथ-साथ अन्य जीवित प्राणियों पर भी बुरा असर पड़ सकता है।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की बुधवार की टिप्पणी का व्यापक संदेश यह है कि पटाखों के मामले में पूर्ण प्रतिबंध और पूरे दिन की छूट के बजाय संतुलित व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए। अदालत ने लोगों की भावनाओं के साथ-साथ बच्चों, बुजुर्गों, बीमार लोगों और अन्य जीवित प्राणियों पर पड़ने वाले प्रभाव को ध्यान में रखने की आवश्यकता बताई है।

इस तरह पटाखों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में त्योहारों की परंपरा और पर्यावरण व सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताओं के बीच संतुलन बनाने का मुद्दा प्रमुख रहा। आगे अदालत की ओर से जारी होने वाले विस्तृत आदेश या निर्देश से इस मामले की स्थिति और स्पष्ट हो सकती है।

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