विदिशा। मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में स्थित प्राचीन धरोहरों के संरक्षण की दिशा में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) एक महत्वपूर्ण पहल करने जा रहा है। जिले की एक पहाड़ी पर स्थित लगभग 1100 साल पुराने रॉक-कट जैन मंदिर को सुरक्षित रखने और उसका मूल स्वरूप बचाने के लिए व्यापक संरक्षण योजना तैयार की गई है। प्रतिहार काल से संबंधित इस ऐतिहासिक स्मारक को संरक्षित करने के लिए अब इसे पूरी तरह खोलकर अलग-अलग हिस्सों में व्यवस्थित किया जाएगा और इसके बाद दोबारा जोड़कर नए चबूतरे पर खड़ा किया जाएगा।
लंबे समय से पर्यटकों के लिए बंद इस मंदिर का संरक्षण भारतीय स्थापत्य कला और जैन धार्मिक विरासत के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मंदिर के पत्थरों और उन पर की गई बारीक नक्काशी को सुरक्षित रखने के लिए विशेष तकनीकी प्रक्रिया अपनाई जाएगी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक यदुवीर सिंह रावत के अनुसार, मंदिर के रेखाचित्र और तकनीकी ड्राइंग तैयार कर लिए गए हैं। अब प्रत्येक पत्थर और उसकी नक्काशी की पहचान कर उसका रिकॉर्ड तैयार किया जा रहा है। यह पूरी प्रक्रिया हाथ से दस्तावेजीकरण करने के साथ-साथ डिजिटल माध्यम से भी की जा रही है।
प्रतिहार काल की ऐतिहासिक धरोहर है मंदिर
विदिशा जिला मध्य प्रदेश के उन क्षेत्रों में शामिल है, जहां प्राचीन भारतीय इतिहास, स्थापत्य कला और धार्मिक परंपराओं के अनेक महत्वपूर्ण प्रमाण मिलते हैं। यहां स्थित लगभग 1100 साल पुराना रॉक-कट जैन मंदिर भी इसी ऐतिहासिक विरासत का हिस्सा है। यह स्मारक प्रतिहार काल से संबंधित बताया जाता है।
प्रतिहार काल भारतीय इतिहास और मंदिर स्थापत्य के विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दौर में धार्मिक संरचनाओं, पत्थरों पर की गई कलात्मक नक्काशी और स्थापत्य निर्माण की विशिष्ट परंपराएं विकसित हुई थीं। विदिशा का यह जैन मंदिर भी अपनी प्राचीन संरचना और शिल्पकला के कारण महत्वपूर्ण है।
रॉक-कट स्थापत्य की विशेषता यह होती है कि इसमें चट्टानों और पत्थरों को काटकर धार्मिक या अन्य संरचनाओं का निर्माण किया जाता है। ऐसे स्मारकों में पत्थरों की बनावट, उनकी स्थिति और उन पर मौजूद नक्काशी ऐतिहासिक जानकारी का महत्वपूर्ण स्रोत होती है। इसलिए इनके संरक्षण में सामान्य इमारतों की तरह मरम्मत करना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि मूल संरचना को समझना और उसकी ऐतिहासिक पहचान बनाए रखना जरूरी होता है।
1930 में भी हुई थी संरक्षण की कोशिश
इस प्राचीन मंदिर को सुरक्षित रखने का प्रयास कोई नया नहीं है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वर्ष 1930 में तत्कालीन ग्वालियर रियासत ने भी इस स्मारक के संरक्षण की कोशिश की थी। हालांकि, उस समय यह प्रयास ज्यादा आगे नहीं बढ़ सका और मंदिर के संरक्षण का काम अधूरा रह गया।

इसके बाद भी मंदिर लंबे समय तक अपनी ऐतिहासिक और स्थापत्य पहचान के साथ मौजूद रहा, लेकिन समय के साथ प्राचीन संरचनाओं को होने वाले प्राकृतिक और अन्य प्रभावों के कारण इनके संरक्षण की आवश्यकता बढ़ती गई।
मंदिर के वर्षों से पर्यटकों के लिए बंद रहने के कारण आम लोगों को भी इसे देखने का अवसर नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में एएसआई की नई संरक्षण योजना से उम्मीद की जा रही है कि इस ऐतिहासिक धरोहर को सुरक्षित रखने की दिशा में ठोस काम हो सकेगा।
करीब एक सदी पहले शुरू हुई संरक्षण की कोशिश को अब आधुनिक तकनीक और व्यवस्थित दस्तावेजीकरण के माध्यम से आगे बढ़ाया जाएगा। यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि प्राचीन स्मारकों को समय रहते संरक्षित नहीं किया जाए तो उनकी मूल बनावट और ऐतिहासिक विशेषताओं को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है।
मंदिर को पूरी तरह खोलकर अलग किए जाएंगे पत्थर
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की योजना के अनुसार, मंदिर को सुरक्षित रखने के लिए उसकी मौजूदा संरचना को पूरी तरह खोलने की प्रक्रिया अपनाई जाएगी। इसके तहत मंदिर के पत्थरों को सावधानीपूर्वक अलग किया जाएगा। प्रत्येक पत्थर की पहचान, स्थिति और उस पर मौजूद नक्काशी का रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा।
यह काम बेहद सावधानी के साथ किया जाएगा, क्योंकि मंदिर का हर पत्थर उसकी ऐतिहासिक संरचना का हिस्सा है। किसी भी पत्थर की पहचान में गलती होने या उसे गलत स्थान पर लगाने से मूल स्थापत्य स्वरूप प्रभावित हो सकता है।
इसी वजह से एएसआई पहले मंदिर की विस्तृत तकनीकी जानकारी तैयार कर रहा है। इसके लिए रेखाचित्र और तकनीकी ड्राइंग बनाई जा चुकी हैं। इनकी मदद से यह समझने में आसानी होगी कि मंदिर के अलग-अलग हिस्से किस प्रकार एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और दोबारा निर्माण के समय उन्हें किस क्रम में लगाया जाना चाहिए।
प्रत्येक पत्थर को हाथ से दर्ज करने के साथ डिजिटल रिकॉर्ड भी तैयार किया जा रहा है। इस प्रक्रिया से भविष्य में संरक्षण से संबंधित जानकारी सुरक्षित रहेगी और जरूरत पड़ने पर किसी विशेष पत्थर या नक्काशी की पहचान आसानी से की जा सकेगी।
नए चबूतरे पर दोबारा खड़ा किया जाएगा मंदिर
संरक्षण योजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मंदिर को नए चबूतरे पर दोबारा खड़ा करना है। इसके लिए पहले सभी पत्थरों को अलग करके उनकी मरम्मत की जाएगी। जिन हिस्सों में सुधार या संरक्षण की जरूरत होगी, उन पर आवश्यक कार्य किया जाएगा। इसके बाद मंदिर को निर्धारित तकनीकी योजना के अनुसार फिर से जोड़ा जाएगा।
नया चबूतरा मंदिर की संरचना को व्यवस्थित और सुरक्षित आधार उपलब्ध कराने की योजना का हिस्सा है। प्राचीन स्मारकों के संरक्षण में आधार की मजबूती महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि पूरी इमारत का भार इसी पर निर्भर करता है।
हालांकि, इस तरह के कार्य में सबसे बड़ी चुनौती मंदिर के मूल स्वरूप को बनाए रखना होती है। संरक्षण के दौरान यह ध्यान रखना जरूरी होगा कि पत्थरों की ऐतिहासिक पहचान, नक्काशी और स्थापत्य विशेषताओं में अनावश्यक बदलाव न हो।
एएसआई की ओर से तैयार की गई तकनीकी ड्राइंग और डिजिटल दस्तावेजीकरण इसी उद्देश्य से महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
विदिशा की ऐतिहासिक विरासत को मिलेगी नई पहचान
विदिशा अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के कारण मध्य प्रदेश के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में गिना जाता है। जिले में मौजूद प्राचीन स्मारक भारतीय इतिहास, धार्मिक परंपराओं और स्थापत्य कला की समृद्ध परंपरा को दर्शाते हैं। ऐसे में 1100 साल पुराने जैन मंदिर का संरक्षण स्थानीय विरासत के लिए भी महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
मंदिर के संरक्षण से भविष्य में विरासत पर्यटन की संभावनाओं को भी बढ़ावा मिल सकता है। फिलहाल यह स्मारक वर्षों से पर्यटकों के लिए बंद है। संरक्षण कार्य पूरा होने और संबंधित अनुमति मिलने के बाद इसके भविष्य में दर्शकों के लिए उपलब्ध होने की संभावनाओं पर ध्यान दिया जा सकेगा। हालांकि, इसे दोबारा पर्यटकों के लिए कब खोला जाएगा, इसकी आधिकारिक जानकारी अभी सामने नहीं आई है।
कुल मिलाकर, विदिशा के इस प्राचीन जैन मंदिर का संरक्षण मध्य प्रदेश की ऐतिहासिक धरोहरों को बचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। वर्ष 1930 में हुई अधूरी कोशिश के लगभग एक सदी बाद अब एएसआई आधुनिक तकनीक, विस्तृत दस्तावेजीकरण और विशेषज्ञों की मदद से इस 1100 साल पुरानी विरासत को नया जीवन देने की तैयारी में है। आने वाले दो वर्षों से अधिक का समय इस ऐतिहासिक स्मारक के भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहने वाला है।




