नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी और हिरासत से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की 24 घंटे की संवैधानिक समय-सीमा उसकी वास्तविक हिरासत शुरू होने के समय से गिनी जाएगी। पुलिस या जांच एजेंसी द्वारा गिरफ्तारी की औपचारिक प्रक्रिया पूरी करने के समय से यह अवधि शुरू नहीं होगी। यानी यदि किसी व्यक्ति को पहले हिरासत में ले लिया जाता है और गिरफ्तारी बाद में आधिकारिक रूप से दर्ज की जाती है, तो बीच का समय भी 24 घंटे की गणना में शामिल होगा।

गुरुवार, 5 नवंबर 2026 को दिए गए इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी और हिरासत के बीच कृत्रिम अंतर पैदा करके किसी व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों को सीमित नहीं किया जा सकता। अदालत के मुताबिक, जिस समय किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर वास्तविक प्रतिबंध लग जाता है, उसी समय से संवैधानिक सुरक्षा लागू हो जाती है। इस फैसले को पुलिस हिरासत, गिरफ्तारी की प्रक्रिया और आरोपियों के मौलिक अधिकारों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
क्या है सुप्रीम कोर्ट का पूरा मामला?
यह फैसला चार आरोपियों की ओर से दायर अपीलों पर आया, जिन्होंने त्रिपुरा हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें जमानत देने से इनकार किया गया था। मामला नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंस (NDPS) अधिनियम के तहत दर्ज एक प्रकरण से जुड़ा था।
मामले के अनुसार, चारों व्यक्तियों को 29 सितंबर 2025 को दोपहर करीब 2 बजे तलाशी और जब्ती की कार्रवाई के दौरान हिरासत में लिया गया था। हालांकि, जांच एजेंसी ने उनकी औपचारिक गिरफ्तारी अगले दिन यानी 30 सितंबर 2025 को सुबह 11 बजे दर्ज की।
इस तरह हिरासत में लिए जाने और औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज होने के बीच लगभग 21 घंटे का अंतर था। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि आरोपियों की स्वतंत्रता हिरासत में लिए जाने के समय से ही सीमित हो चुकी थी। इसलिए उन्हें 29 सितंबर को दोपहर 2 बजे से 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना चाहिए था।
संविधान का अनुच्छेद 22(2) क्या कहता है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 22 गिरफ्तार और हिरासत में रखे गए व्यक्तियों को कुछ महत्वपूर्ण अधिकार प्रदान करता है। इसके तहत किसी भी गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी देना और उसे अपनी पसंद के वकील से सलाह लेने तथा बचाव कराने का अधिकार देना जरूरी है।
अनुच्छेद 22(2) के अनुसार, गिरफ्तार और हिरासत में रखे गए प्रत्येक व्यक्ति को गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर निकटतम न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है।
इस अवधि की गणना करते समय गिरफ्तारी स्थल से मजिस्ट्रेट की अदालत तक पहुंचने में लगने वाला आवश्यक यात्रा समय अलग रखा जा सकता है। इसके अलावा सामान्य परिस्थितियों में कोई अन्य समय इस अवधि से बाहर नहीं किया जा सकता।
गिरफ्तारी और हिरासत को अलग-अलग नहीं माना जा सकता
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में गिरफ्तारी और हिरासत के बीच कृत्रिम अंतर पैदा करने की कोशिश को असंवैधानिक बताया। अदालत के अनुसार, जब किसी व्यक्ति की आवाजाही पर रोक लगा दी जाती है और वह अपनी इच्छा से वहां से जाने के लिए स्वतंत्र नहीं रहता, तो उसकी स्वतंत्रता प्रभावित हो चुकी होती है।
ऐसी स्थिति में यह कहना उचित नहीं होगा कि व्यक्ति अभी औपचारिक रूप से गिरफ्तार नहीं हुआ है, इसलिए उसकी हिरासत का समय संवैधानिक समय-सीमा में शामिल नहीं किया जाएगा।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पूछताछ, तलाशी या जांच के नाम पर किसी व्यक्ति को लंबे समय तक हिरासत में रखने और बाद में गिरफ्तारी दर्ज करने की प्रक्रिया से संवैधानिक सुरक्षा को कमजोर नहीं किया जा सकता।
पीठ ने कहा कि मौलिक अधिकारों पर कोई अस्थायी रोक लगाने की व्यवस्था संविधान में स्वीकार्य नहीं है। व्यक्ति की स्वतंत्रता पर वास्तविक प्रतिबंध लगते ही संबंधित संवैधानिक सुरक्षा लागू हो जाती है




