रायपुर: दीपावली का त्योहार नजदीक आते ही घरों और बाजारों में मां लक्ष्मी की पूजा की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। लोग अपने घरों को सजाने के साथ-साथ पूजा सामग्री, दीपक, फूल, मिठाइयां और मां लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाएं खरीदते हैं। बाजार में इस दौरान मिट्टी, धातु, पत्थर और अन्य सामग्रियों से बनी मूर्तियां उपलब्ध रहती हैं, लेकिन सनातन धर्म की परंपरा में मिट्टी की प्रतिमा का विशेष स्थान माना गया है। दीपावली पर मां लक्ष्मी की मिट्टी की मूर्ति स्थापित कर पूजा करने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। इसके पीछे केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और प्रकृति से जुड़ी मान्यताएं भी हैं।

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ज्योतिष एवं वास्तुविद पंडित प्रियाशरण त्रिपाठी ने मिट्टी की प्रतिमाओं के महत्व को समझाते हुए बताया कि सनातन परंपरा में मिट्टी को अत्यंत शुभ और पवित्र माना गया है। मिट्टी केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं है, बल्कि इसे पृथ्वी तत्व का प्रतीक भी माना जाता है। इसी आधार पर मिट्टी से बनी प्रतिमा की पूजा को प्रकृति के प्रति सम्मान और आस्था से जोड़कर देखा जाता है।
प्रकृति से प्रकृति की पूजा का है धार्मिक आधार
पंडित प्रियाशरण त्रिपाठी के अनुसार, सनातन धर्म में प्रकृति और उसके तत्वों को विशेष महत्व दिया गया है। धार्मिक परंपराओं में पूजा-पाठ के दौरान प्राकृतिक वस्तुओं का इस्तेमाल केवल परंपरा निभाने के लिए नहीं होता, बल्कि इनके माध्यम से प्रकृति के प्रति कृतज्ञता भी व्यक्त की जाती है।
उनका कहना है कि दीपावली पर मां लक्ष्मी की मिट्टी की प्रतिमा की पूजा करने के पीछे भी यही भाव जुड़ा हुआ है। जब प्रकृति से प्राप्त मिट्टी से देवी की प्रतिमा बनाई जाती है और उसी प्रतिमा के माध्यम से प्रकृति की आराधना की जाती है, तो इसे प्रकृति से प्रकृति की पूजा के रूप में समझा जा सकता है।
भारतीय धार्मिक परंपरा में पृथ्वी को जीवन का आधार माना गया है। मनुष्य का भोजन, आवास और जीवन की अनेक आवश्यकताएं प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से धरती पर निर्भर करती हैं। ऐसे में मिट्टी से बनी प्रतिमा के माध्यम से पूजा करना पृथ्वी और प्रकृति के महत्व को स्वीकार करने का भी एक तरीका है।
प्रकृति से प्रकृति की पूजा का है धार्मिक आधार
पंडित प्रियाशरण त्रिपाठी के अनुसार, सनातन धर्म में प्रकृति और उसके तत्वों को विशेष महत्व दिया गया है। धार्मिक परंपराओं में पूजा-पाठ के दौरान प्राकृतिक वस्तुओं का इस्तेमाल केवल परंपरा निभाने के लिए नहीं होता, बल्कि इनके माध्यम से प्रकृति के प्रति कृतज्ञता भी व्यक्त की जाती है।
उनका कहना है कि दीपावली पर मां लक्ष्मी की मिट्टी की प्रतिमा की पूजा करने के पीछे भी यही भाव जुड़ा हुआ है। जब प्रकृति से प्राप्त मिट्टी से देवी की प्रतिमा बनाई जाती है और उसी प्रतिमा के माध्यम से प्रकृति की आराधना की जाती है, तो इसे प्रकृति से प्रकृति की पूजा के रूप में समझा जा सकता है।
भारतीय धार्मिक परंपरा में पृथ्वी को जीवन का आधार माना गया है। मनुष्य का भोजन, आवास और जीवन की अनेक आवश्यकताएं प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से धरती पर निर्भर करती हैं। ऐसे में मिट्टी से बनी प्रतिमा के माध्यम से पूजा करना पृथ्वी और प्रकृति के महत्व को स्वीकार करने का भी एक तरीका है।
मां लक्ष्मी का अन्न, संपत्ति और खेत से भी जुड़ा है संबंध
पंडित प्रियाशरण त्रिपाठी बताते हैं कि मां लक्ष्मी को केवल धन और संपत्ति की देवी के रूप में ही नहीं देखा जाता, बल्कि उनका संबंध अन्न और कृषि से भी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में लक्ष्मी का एक स्वरूप अन्न, दूसरा संपत्ति और एक स्वरूप खेत से जुड़ा हुआ बताया गया है।
इस दृष्टि से मां लक्ष्मी की पूजा का अर्थ केवल आर्थिक समृद्धि की कामना करना नहीं है। इसमें परिवार के लिए भोजन, खेती में खुशहाली, उपज में वृद्धि और जीवन में सुख-समृद्धि की प्रार्थना भी शामिल होती है।
भारत की पारंपरिक संस्कृति में कृषि और धरती का संबंध बहुत गहरा रहा है। खेतों में पैदा होने वाला अनाज ही परिवारों के जीवन और आजीविका का आधार रहा है। किसान अच्छी फसल के लिए धरती, वर्षा और प्रकृति पर निर्भर रहते हैं। इसलिए मां लक्ष्मी की आराधना में अन्न और खेत का महत्व भी विशेष रूप से समझा जाता है।
दीपावली के अवसर पर लक्ष्मी पूजन के दौरान मिट्टी की प्रतिमा का उपयोग इसी व्यापक धार्मिक और सांस्कृतिक भावना को दर्शाता है। यह परंपरा मनुष्य को याद दिलाती है कि समृद्धि का संबंध केवल धन से नहीं, बल्कि अन्न, कृषि और प्राकृतिक संसाधनों से भी है।
पंचतत्व से बना है शरीर, इसलिए मिट्टी का भी विशेष महत्व
सनातन दर्शन में पंचतत्व की अवधारणा को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। इसके अनुसार पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश पांच ऐसे मूल तत्व हैं, जिनसे सृष्टि की संरचना को समझाया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार मानव शरीर भी इन्हीं पांच तत्वों से निर्मित माना जाता है।
इन पांच तत्वों में पृथ्वी तत्व का संबंध स्थिरता, आधार और भौतिक अस्तित्व से जोड़ा जाता है। मिट्टी इसी पृथ्वी तत्व का प्रत्यक्ष प्रतीक मानी जाती है। इसलिए धार्मिक अनुष्ठानों में मिट्टी से बनी वस्तुओं और प्रतिमाओं का उपयोग विशेष महत्व रखता है।
मिट्टी की प्रतिमा के माध्यम से पूजा करने में यह आध्यात्मिक भाव भी जुड़ा रहता है कि मनुष्य प्रकृति का ही हिस्सा है। जिस धरती से जीवन की आवश्यकताएं पूरी होती हैं, उसी धरती के तत्व से प्रतिमा बनाकर देवी-देवताओं की आराधना की जाती है।
इस प्रकार मिट्टी की मूर्ति केवल पूजा की सामग्री नहीं रह जाती, बल्कि वह प्रकृति, जीवन और आध्यात्मिक आस्था के बीच संबंध का प्रतीक बन जाती है।
केवल दीपावली ही नहीं, कई त्योहारों में मिट्टी की प्रतिमाओं की परंपरा
मिट्टी से प्रतिमा बनाकर पूजा करने की परंपरा केवल दीपावली तक सीमित नहीं है। भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में कई धार्मिक और सांस्कृतिक पर्वों के दौरान मिट्टी से बनी प्रतिमाओं का विशेष महत्व देखने को मिलता है।
पंडित प्रियाशरण त्रिपाठी के अनुसार, तीजा, पोला, नवरात्रि, गणेश पूजा, छठ और पार्थिव शिवलिंग पूजन जैसी परंपराओं में भी मिट्टी का महत्वपूर्ण स्थान है।
तीजा पर्व: छत्तीसगढ़ सहित कई क्षेत्रों में तीजा का त्योहार विशेष श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस अवसर पर महिलाएं धार्मिक परंपराओं के अनुसार पूजा-अर्चना करती हैं। स्थानीय रीति-रिवाजों में मिट्टी से जुड़ी पूजा सामग्री का भी उपयोग होता है।
पोला पर्व: यह त्योहार मुख्य रूप से कृषि और पशुधन से जुड़ी परंपराओं का प्रतीक है। किसान बैलों की पूजा करते हैं और खेती में उनके योगदान के प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं। इस पर्व में मिट्टी से बने बैलों का भी सांस्कृतिक महत्व है।
नवरात्रि और गणेश पूजा: इन त्योहारों में अलग-अलग क्षेत्रों में मिट्टी की प्रतिमाएं स्थापित करने की परंपरा प्रचलित है। विशेष रूप से गणेशोत्सव में मिट्टी की प्रतिमाओं को प्राकृतिक और पारंपरिक विकल्प के रूप में महत्व दिया जाता है।
धार्मिक आस्था के साथ संस्कृति और प्रकृति का संदेश
दीपावली पर मिट्टी की मां लक्ष्मी की प्रतिमा की पूजा करने की परंपरा भारतीय संस्कृति की उस सोच को सामने लाती है, जिसमें प्रकृति को जीवन का आधार माना गया है। पंडित प्रियाशरण त्रिपाठी द्वारा बताई गई मान्यताओं के अनुसार, मां लक्ष्मी का संबंध धन के साथ-साथ अन्न, खेत और संपत्ति से भी है। ऐसे में मिट्टी की प्रतिमा के माध्यम से उनकी आराधना प्रकृति और समृद्धि के आपसी संबंध को दर्शाती है।
कुल मिलाकर, मिट्टी की मूर्ति का महत्व केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है। इसमें पंचतत्व की अवधारणा, पृथ्वी के प्रति सम्मान, कृषि संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण जैसे कई पहलू जुड़े हुए हैं। यही वजह है कि दीपावली पर मिट्टी की लक्ष्मी प्रतिमा की पूजा को सनातन परंपरा में विशेष स्थान दिया जाता है। यह परंपरा एक संदेश भी देती है कि सच्ची समृद्धि केवल धन-संपत्ति में नहीं, बल्कि प्रकृति, अन्न और जीवन के संतुलन में भी निहित है।




