क्या प्रदूषण से बढ़ सकता है डायबिटीज का खतरा? AIIMS के डॉक्टर ने बताया, घर में रहने और शारीरिक गतिविधियां कम होने से बिगड़ सकती है ब्लड शुगर

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नई दिल्ली। दिल्ली-एनसीआर समेत देश के कई शहरों में बढ़ता वायु प्रदूषण लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। प्रदूषण का असर केवल फेफड़ों और सांस से जुड़ी बीमारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दिल, त्वचा और शरीर के दूसरे महत्वपूर्ण अंगों को भी प्रभावित कर सकता है। अब एक और महत्वपूर्ण सवाल सामने आ रहा है कि क्या खराब हवा और प्रदूषण के कारण डायबिटीज यानी मधुमेह का खतरा भी बढ़ सकता है? स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, प्रदूषण और डायबिटीज के बीच संबंध को समझने के लिए केवल जहरीली हवा के सीधे प्रभाव को देखना पर्याप्त नहीं है। प्रदूषण के कारण बदलने वाली जीवनशैली भी ब्लड शुगर को प्रभावित कर सकती है।

नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के एंडोक्राइनोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. राजेश खड्गावत ने इस विषय पर Aajtak.in से बातचीत में महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है। उनके मुताबिक, जब प्रदूषण का स्तर बढ़ता है तो लोग अपनी सामान्य दिनचर्या में बदलाव करने लगते हैं। खासतौर पर सुबह और शाम की सैर, पार्क में टहलना और बाहर की शारीरिक गतिविधियां कम हो जाती हैं। इसका असर शरीर की मेटाबॉलिक गतिविधियों और ब्लड शुगर नियंत्रण पर पड़ सकता है।

प्रदूषण बढ़ने पर घरों में कैद हो जाती है दिनचर्या

जब दिल्ली-एनसीआर में हवा की गुणवत्ता खराब होती है, तब स्वास्थ्य की चिंता के चलते लोग घरों से बाहर निकलना कम कर देते हैं। आमतौर पर सुबह की सैर, शाम को पार्क में टहलना, साइकिल चलाना और खुले मैदान में व्यायाम करना लोगों की दिनचर्या का हिस्सा होता है। लेकिन प्रदूषण बढ़ने पर इन गतिविधियों में कमी आने लगती है।

डॉ. राजेश खड्गावत के अनुसार, प्रदूषण के दिनों में लोग बाहर निकलना और सुबह-शाम टहलना बंद कर देते हैं। इससे उनकी शारीरिक गतिविधियां कम हो जाती हैं। जब शरीर लंबे समय तक कम सक्रिय रहता है, तो कैलोरी खर्च होने की प्रक्रिया प्रभावित होती है। इसका असर वजन और शरीर के मेटाबॉलिज्म पर भी पड़ सकता है।

शारीरिक गतिविधियों का ब्लड शुगर नियंत्रण में महत्वपूर्ण योगदान होता है। नियमित व्यायाम करने से मांसपेशियां ग्लूकोज का इस्तेमाल करती हैं। इससे शरीर को रक्त में मौजूद शुगर का उपयोग करने में मदद मिलती है। इसके विपरीत, लंबे समय तक बैठे रहने और व्यायाम नहीं करने की आदत इंसुलिन की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकती है।

घर में रहने से बदल सकता है खानपान का तरीका

प्रदूषण के कारण केवल लोगों की एक्सरसाइज और चलने-फिरने की आदत प्रभावित नहीं होती, बल्कि उनके खानपान के रूटीन में भी बदलाव आ सकता है। जब लोग अधिक समय घर में बिताते हैं, तो कुछ लोगों की खाने-पीने की आदतें बदलने लगती हैं।

डॉ. खड्गावत के मुताबिक, घर में रहने के दौरान कुछ लोग बिना भूख के बार-बार कुछ न कुछ खाते रहते हैं। कई बार खाली समय में स्नैक्स, मीठी चीजें, बिस्किट, नमकीन और अन्य खाद्य पदार्थों का सेवन बढ़ जाता है। इस तरह की आदतें शरीर में अतिरिक्त कैलोरी पहुंचा सकती हैं।

यदि शारीरिक गतिविधियां भी कम हों और खाने की मात्रा बढ़ जाए, तो वजन बढ़ने की आशंका रहती है। वजन बढ़ना विशेष रूप से पेट के आसपास चर्बी जमा होना और इंसुलिन रेजिस्टेंस जैसी स्थितियां टाइप-2 डायबिटीज के जोखिम से जुड़ी हैं।

इंसुलिन एक हार्मोन है, जो रक्त में मौजूद ग्लूकोज को शरीर की कोशिकाओं तक पहुंचाने में मदद करता है। जब शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति कम संवेदनशील हो जाती हैं, तो इसे इंसुलिन रेजिस्टेंस कहा जाता है। ऐसी स्थिति में ब्लड शुगर को सामान्य बनाए रखना कठिन हो सकता है।

क्या प्रदूषण सीधे डायबिटीज का कारण बन सकता है?

वायु प्रदूषण और डायबिटीज के बीच संबंध को लेकर दुनिया भर में वैज्ञानिक अध्ययन किए जा रहे हैं। कुछ शोधों में लंबे समय तक वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने और टाइप-2 डायबिटीज के बढ़ते जोखिम के बीच संबंध पाया गया है।

हवा में मौजूद सूक्ष्म प्रदूषक कण, विशेषकर PM2.5 और PM10, सांस के जरिए शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। PM2.5 बेहद छोटे कण होते हैं, जो फेफड़ों के भीतर तक पहुंच सकते हैं। लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से शरीर में सूजन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस जैसी प्रक्रियाएं प्रभावित हो सकती हैं।

शरीर में लगातार सूजन और मेटाबॉलिक बदलाव इंसुलिन की कार्यक्षमता पर असर डाल सकते हैं। कुछ वैज्ञानिक शोधों में यह संभावना भी जताई गई है कि प्रदूषण का लंबे समय तक संपर्क इंसुलिन रेजिस्टेंस और ग्लूकोज नियंत्रण से जुड़ी समस्याओं में योगदान दे सकता है।

हालांकि, यह समझना जरूरी है कि प्रदूषण में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को डायबिटीज हो जाएगी, ऐसा नहीं है। मधुमेह एक जटिल बीमारी है, जिसके पीछे आनुवंशिक कारण, खानपान, वजन, शारीरिक गतिविधियां, उम्र और अन्य स्वास्थ्य संबंधी कारक भी भूमिका निभाते हैं।

प्रदूषण के समय भी व्यायाम पूरी तरह बंद न करें

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, खराब हवा से बचाव का मतलब यह नहीं है कि शारीरिक गतिविधियां पूरी तरह बंद कर दी जाएं। यदि बाहर का AQI यानी एयर क्वालिटी इंडेक्स खराब है, तो खुले वातावरण में दौड़ने या तेज चलने से बचना समझदारी हो सकती है। लेकिन घर के अंदर सुरक्षित तरीके से हल्की शारीरिक गतिविधियां जारी रखी जा सकती हैं।

इसके लिए कुछ आसान उपाय अपनाए जा सकते हैं।

1. घर में टहलने की आदत डालें: घर के अंदर उपलब्ध जगह पर कुछ मिनट पैदल चल सकते हैं। लगातार लंबे समय तक बैठे रहने के बजाय बीच-बीच में उठकर चलना फायदेमंद हो सकता है।

2. हल्की एक्सरसाइज करें: घर के अंदर स्ट्रेचिंग, हल्के योगासन और अपनी क्षमता के अनुसार व्यायाम किया जा सकता है। इससे शरीर सक्रिय बना रहता है।

3. लंबे समय तक लगातार न बैठें: यदि आप घर से काम करते हैं, तो बीच-बीच में ब्रेक लें। कुछ मिनट खड़े रहना या कमरे में टहलना भी दिनभर की निष्क्रियता कम करने में मदद कर सकता है।

3. लंबे समय तक लगातार न बैठें: यदि आप घर से काम करते हैं, तो बीच-बीच में ब्रेक लें। कुछ मिनट खड़े रहना या कमरे में टहलना भी दिनभर की निष्क्रियता कम करने में मदद कर सकता है।

4. खानपान पर नियंत्रण रखें: भूख लगने पर ही भोजन करें। बार-बार मीठे स्नैक्स और अधिक कैलोरी वाले खाद्य पदार्थ खाने से बचें। संतुलित आहार में सब्जियां, दालें, फल और फाइबर युक्त खाद्य पदार्थ शामिल करें।

5. घर की हवा की गुणवत्ता पर ध्यान दें: प्रदूषण के दिनों में खिड़कियां खोलने और बंद करने का निर्णय बाहर की वायु गुणवत्ता के अनुसार लें। जरूरत के अनुसार उपयुक्त एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल भी किया जा सकता है।

डायबिटीज के मरीजों को बरतनी चाहिए अतिरिक्त सावधानी

जिन लोगों को पहले से डायबिटीज है, उन्हें प्रदूषण के दिनों में अपनी दिनचर्या को लेकर अधिक सतर्क रहने की जरूरत है। बाहर टहलना संभव न होने पर घर के अंदर व्यायाम के विकल्प अपनाए जा सकते हैं। साथ ही डॉक्टर की सलाह के अनुसार दवाएं और निर्धारित खानपान जारी रखना चाहिए।

इसके अलावा समय-समय पर ब्लड शुगर की जांच करना भी महत्वपूर्ण है। जिन लोगों के परिवार में डायबिटीज का इतिहास है, जिनका वजन अधिक है या जिन्हें लंबे समय तक बैठकर काम करना पड़ता है, उन्हें भी अपनी जीवनशैली पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

यदि ब्लड शुगर बार-बार सामान्य सीमा से अधिक आ रही है, तो चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए। बिना डॉक्टर की सलाह के दवाओं की खुराक में बदलाव नहीं करना चाहिए।

दिल्ली-एनसीआर में बढ़ता प्रदूषण लोगों के स्वास्थ्य के लिए कई तरह की चुनौतियां पैदा कर रहा है। फेफड़ों, हृदय और त्वचा पर इसके प्रभाव के साथ-साथ मेटाबॉलिक स्वास्थ्य को लेकर भी सतर्क रहने की जरूरत है। AIIMS के प्रोफेसर डॉ. राजेश खड्गावत की बताई गई जानकारी इस बात पर ध्यान दिलाती है कि प्रदूषण के कारण घरों में सीमित हो जाना, शारीरिक गतिविधियां कम करना और बार-बार खाना जैसी आदतें ब्लड शुगर नियंत्रण को प्रभावित कर सकती हैं।

हालांकि प्रदूषण को डायबिटीज का सीधा और एकमात्र कारण नहीं कहा जा सकता, लेकिन खराब वायु गुणवत्ता के दौरान भी सक्रिय और संतुलित जीवनशैली बनाए रखना जरूरी है। इसलिए बाहर की हवा खराब होने पर घर के अंदर व्यायाम, संतुलित खानपान और नियमित स्वास्थ्य जांच को दिनचर्या का हिस्सा बनाना चाहिए। इससे प्रदूषण के मौसम में भी मेटाबॉलिक स्वास्थ्य की बेहतर देखभाल की जा सकती है।

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