बालाघाट। मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के बिरसा विकासखंड में स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। यहां मलेरिया और खसरा से 32 बैगा आदिवासी बच्चों की मौत के मामले के बीच एक ऐसे व्यक्ति की डिग्री फर्जी पाए जाने की जानकारी सामने आई है, जो लंबे समय तक क्षेत्र की स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ा रहा। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, देवास के डॉ. सुनील सिंह के नाम से रीवा के शिवकुमार पिता रामलखन पांडेय ने नौकरी की थी। वह वर्ष 2012 से बिरसा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में पदस्थ था और वर्ष 2022 में उसे ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर (बीएमओ) की जिम्मेदारी भी दी गई थी।
2012 से बिरसा में दे रहा था सेवाएं
पुलिस के अनुसार, रीवा निवासी शिवकुमार पिता रामलखन पांडेय ने देवास के डॉ. सुनील सिंह के नाम से नौकरी की थी। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, उसकी नियुक्ति वर्ष 2008 में संविदा पर हुई थी और वर्ष 2012 से वह बिरसा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में पदस्थ था। बाद में वर्ष 2022 में उसे ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर बनाया गया।
इस कड़ी में बता दें कि, बीएमओ की जिम्मेदारी किसी भी विकासखंड में स्वास्थ्य सेवाओं के संचालन और निगरानी के लिहाज से महत्वपूर्ण होती है। इसके अंतर्गत स्वास्थ्य केंद्रों के कामकाज, टीकाकरण, संक्रामक रोगों की रोकथाम, दवाओं की उपलब्धता और सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रमों के क्रियान्वयन जैसे कार्यों की निगरानी शामिल हो सकती है।
इसके अंतर्गत स्वास्थ्य केंद्रों के कामकाज, टीकाकरण, संक्रामक रोगों की रोकथाम, दवाओं की उपलब्धता और सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रमों के क्रियान्वयन जैसे कार्यों की निगरानी शामिल हो सकती है।
इस पद पर रहते हुए संबंधित व्यक्ति के पास लगभग चार वर्षों तक ब्लॉक की स्वास्थ्य सेवाओं की कमान रहने की जानकारी दी गई है। ऐसे में उसकी शैक्षणिक योग्यता और नियुक्ति से जुड़े दस्तावेजों का सत्यापन प्रशासनिक जवाबदेही का महत्वपूर्ण विषय बन गया है।
अप्रैल में डिग्री पर उठे थे सवाल
मामले में इस वर्ष अप्रैल में संबंधित व्यक्ति की डिग्री को लेकर सवाल उठे थे। इसके बाद राज्य स्तरीय समिति ने जांच शुरू की। अब उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उसकी डिग्री फर्जी पाई गई है। इसके बाद पुलिस ने 10 अक्टूबर को उसके विरुद्ध एफआईआर दर्ज की।
इस घटनाक्रम ने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में नियुक्ति के समय शैक्षणिक प्रमाणपत्रों और पेशेवर योग्यताओं के सत्यापन की प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं। स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े पदों पर कार्यरत कर्मचारियों की योग्यता की पुष्टि इसलिए आवश्यक है, क्योंकि उनके निर्णय और प्रशासनिक कामकाज का सीधा असर मरीजों को मिलने वाली सेवाओं पर पड़ सकता है।
यहां हम आपको बता दें कि, बालाघाट के बिरसा विकासखंड का यह मामला केवल एक कथित फर्जी डिग्री तक सीमित नहीं है। इससे सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता, आदिवासी क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता, संक्रामक रोगों की रोकथाम और विभागीय जवाबदेही जैसे व्यापक मुद्दे जुड़े हैं।
फिलहाल, उपलब्ध जानकारी के अनुसार संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध 10 अक्टूबर को एफआईआर दर्ज की गई है और पुलिस उसकी तलाश कर रही है। आगे की जांच में डिग्री की पुष्टि, नियुक्ति प्रक्रिया, स्वास्थ्य कार्यक्रमों के रिकॉर्ड और कथित अनियमितताओं से संबंधित तथ्यों को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण होगा।





