नई दिल्ली। सर्दियों की शुरुआत के साथ बाजार में हरी पत्तेदार सब्जियों की मांग बढ़ने लगती है। इस मौसम में पालक, मेथी, सरसों के साथ बथुआ भी लोगों की पसंद में शामिल रहता है। बथुआ एक ऐसी पत्तेदार सब्जी है, जिसकी खेती के लिए बहुत अधिक जमीन की जरूरत नहीं होती। घर, खेत या फार्म हाउस के आसपास उपलब्ध थोड़ी खाली जमीन का उपयोग भी इसके उत्पादन के लिए किया जा सकता है। कम समय में तैयार होने और पत्तियों की कई बार कटाई की संभावना के कारण बथुए की खेती छोटे स्तर पर अतिरिक्त आय का विकल्प बन सकती है। किसानों के लिए खास बात यह है कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद यानी ICAR के भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान ने ‘काशी बथुआ-4’ नाम की किस्म विकसित की है, जो उत्तर प्रदेश के लिए घोषित और लागू है। यह किस्म करीब 40 से 45 दिन में पहली कटाई के लिए तैयार हो सकती है।
सर्दियों में बढ़ जाती है बथुए की मांग
ठंड का मौसम शुरू होते ही बाजार में हरी पत्तेदार सब्जियों की उपलब्धता बढ़ने लगती है। इसी क्रम में बथुआ भी सब्जी मंडियों और घरों की रसोई में आसानी से दिखाई देने लगता है। सर्दियों में इसकी मांग बढ़ने के कारण किसान मौसम के अनुरूप इसकी खेती करके स्थानीय बाजार में उपज बेच सकते हैं।
बथुए की खासियत यह है कि इसे बहुत बड़े खेत की आवश्यकता नहीं होती। अगर किसी किसान के पास खेत के अलावा घर या फार्म हाउस के आसपास थोड़ी खाली जमीन उपलब्ध है, तो उस जमीन का उपयोग भी बथुए की खेती के लिए किया जा सकता है। इस तरह छोटे क्षेत्र में भी पत्तेदार सब्जी का उत्पादन किया जा सकता है।
एक बार बोने के बाद कई बार पत्तियों की कटाई
बथुए की खेती में एक और विशेषता पत्तियों की कटाई से जुड़ी है। इसकी पत्तियों की एक से अधिक बार कटाई की जा सकती है। इसका अर्थ है कि पहली कटाई के बाद उपयुक्त परिस्थितियों में दोबारा पत्तियां विकसित हो सकती हैं और किसान अगली कटाई कर सकते हैं।
किसानों के लिए बार-बार पत्तियों की कटाई बाजार में लगातार ताजा उपज उपलब्ध कराने का अवसर देती है। हालांकि, कितनी बार और कितनी मात्रा में कटाई संभव होगी, यह फसल की वृद्धि, देखभाल, मौसम और अन्य कृषि परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
सर्दियों के मौसम में बथुआ किसानों के लिए कम अवधि में तैयार होने वाली पत्तेदार सब्जी के रूप में एक विकल्प बन सकता है। काशी बथुआ-4 की पहली कटाई करीब 40-45 दिन में होने की जानकारी और पत्तियों की कई बार कटाई की संभावना इसे छोटे क्षेत्र में खेती करने वाले किसानों के लिए उपयोगी बना सकती है।
हालांकि, खेती से होने वाली वास्तविक आय बाजार भाव, उत्पादन लागत, उपज की मात्रा और बिक्री व्यवस्था पर निर्भर करेगी। इसलिए किसानों को केवल संभावित कमाई के आधार पर निर्णय लेने के बजाय स्थानीय बाजार और कृषि लागत का आकलन करके योजना बनानी चाहिए। सही मौसम, उपयुक्त किस्म और बाजार की मांग को ध्यान में रखकर बथुए की खेती किसानों के लिए अतिरिक्त आय का एक व्यावहारिक विकल्प बन सकती है।





