भोपाल। भोपाल में प्रस्तावित मास्टर प्लान के ड्राफ्ट को लेकर चर्चा तेज हो गई है। जमीन के इस्तेमाल यानी लैंड-यूज के वर्गीकरण, सड़कों के अलाइनमेंट और मौजूदा रिहायशी इलाकों के भविष्य को लेकर नागरिकों और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों की चिंताएं सामने आ रही हैं। प्रस्तावित जोनिंग व्यवस्था तथा पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में बदलाव की मांग ने शहरी नियोजन से जुड़े मुद्दों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। टाउन एंड कंट्री प्लानिंग (T&CP) विभाग के पास 25 अक्टूबर की अंतिम समयसीमा से पहले लगभग 800 सुझाव और आपत्तियां पहुंचने की जानकारी है। अब विभाग इन पर विचार करने के बाद मास्टर प्लान को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया आगे बढ़ाएगा।
मास्टर प्लान किसी भी शहर के भविष्य के विकास की रूपरेखा तैयार करने वाला महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है। इसमें यह तय किया जाता है कि अलग-अलग क्षेत्रों में जमीन का उपयोग किस प्रकार किया जाएगा, सड़कें कहां से गुजरेंगी और आवासीय, व्यावसायिक तथा अन्य गतिविधियों का विस्तार किस दिशा में हो सकता है। इसलिए इस तरह के दस्तावेज में प्रस्तावित बदलावों का असर केवल नए निर्माण कार्यों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पहले से बसे इलाकों और वहां रहने वाले लोगों की जरूरतों से भी जुड़ता है।

आखिर मे बताते चले कि, मास्टर प्लान से जुड़ी बहस यह भी रेखांकित करती है कि शहरी नियोजन केवल सड़कों और भवनों के निर्माण तक सीमित नहीं है। इसका संबंध जमीन के उपयोग, नागरिक सुविधाओं, मौजूदा आबादी और पर्यावरण संरक्षण से भी है।फिलहाल अंतिम निर्णयों के बारे में स्थिति स्पष्ट नहीं है। अब यह देखना होगा कि विभाग प्राप्त सुझावों और आपत्तियों की समीक्षा के बाद ड्राफ्ट में क्या संशोधन करता है और अंतिम मास्टर प्लान में जमीन के उपयोग, सड़क अलाइनमेंट तथा संवेदनशील क्षेत्रों से जुड़े प्रावधान किस रूप में सामने आते हैं।




