बस्तर दशहरा के मुरिया दरबार में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने की आदिवासी न्याय परंपरा की सराहना, बोलीं- अदालतों में फैसलों में लग जाते हैं 10 से 30 साल

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बस्तर/छत्तीसगढ़। आदिवासी समाज की पारंपरिक व्यवस्था में विवादों के समाधान और सामाजिक समरसता बनाए रखने की भूमिका को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने रेखांकित किया। शुक्रवार को बस्तर दशहरा के अवसर पर आयोजित परंपरागत मुरिया दरबार में उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की अपनी ऐसी व्यवस्थाएं हैं, जिनके माध्यम से गांवों में ही कई विवादों का समाधान किया जाता है। इसके विपरीत, आधुनिक न्याय व्यवस्था में मुकदमों के फैसले आने में कई बार 10, 20 और यहां तक कि 30 वर्ष तक लग जाते हैं।

मुरिया दरबार में आदिवासी परंपरा का उल्लेख

बस्तर दशहरा छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा पर्व है। इसकी परंपराएं देश के कई अन्य क्षेत्रों में मनाए जाने वाले दशहरा उत्सव से अलग हैं। बस्तर में इस आयोजन का संबंध स्थानीय देवी-परंपराओं, आदिवासी समुदायों की आस्थाओं और लंबे समय से चली आ रही सामाजिक व्यवस्थाओं से है।

इसी परंपरा के अंतर्गत आयोजित मुरिया दरबार को सामाजिक संवाद और स्थानीय मुद्दों पर चर्चा का महत्वपूर्ण मंच माना जाता है। यहां आदिवासी समाज की परंपराओं, सामुदायिक नेतृत्व और स्थानीय प्रशासन से जुड़े विषयों को विशेष महत्व मिलता है।

मांझी से परगना तक कैसे काम करती है पारंपरिक व्यवस्था?

आदिवासी समाज के विभिन्न समुदायों में स्थानीय नेतृत्व और विवादों के समाधान की अपनी-अपनी परंपराएं रही हैं। बस्तर क्षेत्र में मांझी और परगना जैसे पारंपरिक पदों का उल्लेख सामुदायिक व्यवस्था के संदर्भ में किया जाता है। इन संस्थाओं की भूमिका स्थानीय रीति-रिवाजों, समुदाय की परंपराओं और संबंधित क्षेत्र की सामाजिक संरचना के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।

राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में इसी पारंपरिक व्यवस्था की ओर संकेत किया। उनके अनुसार, आदिवासी समाज में विवादों को गांव के स्तर पर सुलझाने की व्यवस्था होने से लोगों को अपने मामलों के समाधान के लिए लंबे समय तक इंतजार नहीं करना पड़ता।

ऐसी व्यवस्थाओं में समुदाय के अनुभवी सदस्य या पारंपरिक नेतृत्व विवाद से जुड़े पक्षों की बात सुनते हैं और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार समाधान तलाशने का प्रयास करते हैं। कई मामलों में आपसी बातचीत, सहमति और सामाजिक संबंधों को सामान्य बनाए रखने पर जोर दिया जाता है।

अदालतों में 10, 20 और 30 साल तक क्यों लगते हैं?

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने न्यायिक प्रक्रिया में होने वाली देरी का उल्लेख करते हुए कहा कि अदालतों में मुकदमों के फैसले आने में 10, 20 और 30 वर्ष तक लग जाते हैं। यह टिप्पणी न्याय तक समय पर पहुंच और न्यायिक प्रक्रिया की गति को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल उठाती है।

लंबे समय तक चलने वाले मुकदमों का प्रभाव केवल संबंधित पक्षों तक सीमित नहीं रहता। किसी संपत्ति, पारिवारिक विवाद, आर्थिक दावे या अन्य कानूनी मामले के लंबित रहने से लोगों को आर्थिक और मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। कई बार मुकदमे के निपटारे में देरी के कारण पक्षकारों को लंबे समय तक अनिश्चितता में रहना पड़ता है।

न्यायिक प्रक्रिया में देरी के पीछे कई संभावित कारण हो सकते हैं। इनमें अदालतों में लंबित मामलों की संख्या, न्यायाधीशों और न्यायिक संसाधनों की उपलब्धता, गवाहों की पेशी, साक्ष्यों की जांच, बार-बार स्थगन और कानूनी प्रक्रिया की जटिलताएं शामिल हैं। हालांकि, हर मामले में देरी के कारण अलग हो सकते हैं।

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